बुधवार, 27 मई 2026
पहले ‘गांव’ और अब स्कूल हुए ‘खाली’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-15
खाली होते गांवों के स्कूल, निजी शिक्षा का बढ़ा बोझ, 2027 के विधानसभा के रण में होगी सत्ता की परीक्षा
---सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसी शिक्षा व्यवस्था बनी जनता की सबसे बड़ी नाराजगी
---स्मार्ट क्लास के दावों के पीछे शिक्षक विहीन स्कूलों की कड़वी सच्चाई अब बनी बहस का केंद्र
---प्रदेश में बदहाल सरकारी व्यवस्थाएं आगामी चुनाव में सत्ता की परीक्षा लेने को है तैयार
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। राज्य में पारंपरिक तौर पर पलायन, रोजगार और जल-जंगल-जमीन जैसे बुनियादी मुद्दे हावी रहे हैं, लेकिन बदलते समय के साथ इस बार शिक्षा और स्कूल सुधार एक ऐसा केंद्रीय मुद्दा बनता दिख रहा है जो किसी भी दल का खेल बना या बिगाड़ सकता है।
सरकारी आंकड़ों में शिक्षा व्यवस्था भले पटरी पर दिखाई जाती हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हजारों अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर कस्बों और शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। राज्य के पर्वतीय इलाकों में लगातार बंद हो रहे प्राथमिक विद्यालय अब केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व का सवाल बनते जा रहे हैं। गांवों में स्कूल बंद होने का सीधा असर बसावट पर पड़ रहा है, जिस गांव में कभी बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। यही कारण है कि शिक्षा अब केवल बच्चों का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है।
सरकारें वर्षों से स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा नीति के दावे करती रही हैं, लेकिन पहाड़ के दूरस्थ गांवों में आज भी बच्चे टूटी छतों, जर्जर कमरों और बिना विज्ञान-गणित शिक्षकों के पढ़ने को मजबूर हैं। कई इंटर कालेजों में महीनों तक विषय विशेषज्ञ नहीं पहुंचते। अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से लगातार टूट रहा है और यही कारण है कि गांव का गरीब परिवार भी बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहा है।
प्रदेश के पर्वतीय जिलों में लगातार घटती छात्र संख्या सरकार के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। सैकड़ों स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या दूसरे स्कूलों में समायोजित कर दिए गए हैं। गांवों में लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब स्कूल ही नहीं बचेंगे तो गांव कैसे बचेंगे? चुनाव से पहले विपक्ष अब इसी मुद्दे को हथियार बनाने की तैयारी में है। बेरोजगार बीएड और डीएलएड प्रशिक्षित युवाओं में भी नाराजगी बढ़ रही है। वर्षों से भर्ती प्रक्रिया लटकी रहने और अतिथि शिक्षकों के भरोसे शिक्षा व्यवस्था चलने पर युवाओं में असंतोष है।
वहीं शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में शिक्षा केवल पढ़ाई का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह पलायन, रोजगार और गांवों के अस्तित्व से सीधे जुड़ा प्रश्न बन चुका है, जिस गांव में अच्छा स्कूल नहीं होगा, वहां परिवार रुकना नहीं चाहेगा। राज्य में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर होने के बावजूद, बुनियादी शिक्षा का ढांचा और नीतियों में हो रहे बदलाव इस बार चुनावी रण में मुख्य मुद्दा बनने की ओर अग्रसर हैं। उत्तराखंड का सबसे बड़ा दर्द है पलायन। लोग पहाड़ों से मैदानी इलाकों की तरफ सिर्फ रोजगार के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए भी भाग रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के कई गांवों में सिर्फ इसलिए ताले लटक गए क्योंकि वहां बच्चों के लिए अच्छे स्कूल या कालेज नहीं थे।
बाक्स
टूटी छतें और जर्जर स्कूल के कमरें
बीते कुछ वर्षों में सरकार ने स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, अंग्रेजी माध्यम और नई शिक्षा नीति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इंटरनेट और शिक्षकों की कमी ने इन योजनाओं की रफ्तार रोक दी है। पहाड़ के कई विद्यालय आज भी टूटी छतों, जर्जर कमरों और सीमित संसाधनों के सहारे चल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की बढ़ती फीस ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। अभिभावकों में यह भावना तेजी से बढ़ रही है कि सरकारी स्कूलों में भविष्य सुरक्षित नहीं है। यही नाराजगी आने वाले चुनावों में राजनीतिक रंग ले सकती है।
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