बुधवार, 3 जून 2026
स्वाद में ‘देसी’ और डिमांड में ‘विदेशी’
कोदे की रोटी: कभी मोटा अनाज कहकर थाली से बाहर किया, आज वही बनी महंगा सुपरफूड
---कभी मजबूरी का भोजन मानी जाती थी मड़ुआ की रोटी, आज स्वास्थ्यवर्धक आहार के रूप में बढ़ी मांग
---कैल्शियम, आयरन और फाइबर से भरपूर कोदा बना आधुनिक जीवनशैली का पसंदीदा अनाज
---उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को नई पहचान दिला रही है कोदे की रोटी
---आज इंटरनेट पर ट्रेंड कर रहा पहाड़ का कोदा, फिटनेस फ्रीक्स भी हुए इसके दीवाने
---पिज्जा-बर्गर छोड़ अब मड़ुए की रोटी के पीछे भाग रही है पूरी दुनिया
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों से लोगों के जीवन और संस्कृति का हिस्सा रही कोदे की रोटी आज फिर चर्चा में है। कभी ग्रामीण परिवारों के दैनिक भोजन का प्रमुख हिस्सा रही यह पारंपरिक रोटी अब सुपरफूड के रूप में देश-दुनिया में पहचान बना रही है। बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच कोदा, जिसे मड़ुआ या रागी भी कहा जाता है, एक बार फिर लोगों की थाली में लौट रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कोदे की खेती किसानों के लिए हमेशा सहारा रही है। कम पानी, कम संसाधनों और प्रतिकूल मौसम में भी यह फसल आसानी से तैयार हो जाती है। यही कारण है कि उत्तराखंड के गांवों में लंबे समय तक कोदा मुख्य खाद्यान्न के रूप में उपयोग किया जाता रहा। पारंपरिक रूप से कोदे के आटे से बनी रोटी को घी, भांग की चटनी, गहत की दाल या पहाड़ी सब्जियों के साथ खाया जाता है। इसका स्वाद जितना सादा होता है, पोषण उतना ही अधिक। विशेषज्ञों के अनुसार रागी में कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। मधुमेह और मोटापे जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए भी इसे लाभकारी माना जाता है।
समय के साथ जब बाजार में गेहूं और चावल की उपलब्धता बढ़ी तो कोदे की खेती और इसके सेवन में कमी आने लगी। कई परिवारों ने इसे पिछड़ेपन और गरीबी से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पोषण वैज्ञानिकों की सलाह के बाद इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। राज्य सरकार और विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएं भी मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रही हैं। स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के प्रयासों से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने लगा है। देहरादून, )षिकेश और अन्य शहरों के कई रेस्तरां और होटल भी अपने मेन्यू में कोदे की रोटी को शामिल कर रहे हैं।
ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूह कोदे से बने बिस्कुट, कुकीज, लड्डू और अन्य उत्पाद तैयार कर स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहे हैं। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, बल्कि पारंपरिक कृषि और खानपान संस्कृति का संरक्षण भी हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में कोदा जैसे मोटे अनाज भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। कम संसाधनों में उत्पादन और उच्च पोषण मूल्य इसे अन्य फसलों से अलग बनाता है।
उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का प्रतीक बन चुकी कोदे की रोटी आज नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बन रही है। कभी पहाड़ की साधारण थाली में परोसी जाने वाली यह रोटी अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में पहचान बना रही है।
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