मंगलवार, 16 जून 2026
पहाड़ की मिट्टी का वरदान है ‘चौलाई’
पहाड़ की पारंपरिक फसल में छिपा है सेहत का खजाना
चौलाई को बाजार मिला तो बदल जाएंगी किसानों की तस्वीर
आज दुनियाभर में सुपरफूड के रूप में बढ़ रही इसकी पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में यदि किसी फसल ने सदियों से लोगों की भूख मिटाने के साथ-साथ उन्हें ताकत और सेहत भी दी है, तो वह है चौलाई। कभी गांवों के खेतों में आमतौर पर उगाई जाने वाली यह पारंपरिक फसल आज सुपरफूड के रूप में दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस चौलाई को पहाड़ के लोग वर्षों से खाते आ रहे हैं, उसकी असली कीमत अब दुनिया समझने लगी है।
पहाड़ की सीढ़ीनुमा खेती में उगने वाली चौलाई केवल एक अनाज नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते समय के साथ भले ही लोगों की खान-पान की आदतें बदल गई हों, लेकिन चौलाई का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। गढ़वाल और कुमाऊं के अधिकांश क्षेत्रों में चौलाई की खेती वर्षों से होती रही है। कम पानी और कम संसाधनों में तैयार होने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों के लिए हमेशा भरोसेमंद रही है। बरसात के मौसम में बोई जाने वाली चौलाई शरद )तु तक तैयार हो जाती है।
पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लगभग हर गांव में चौलाई के खेत दिखाई देते थे। घरों में इसकी रोटी बनती थी, लड्डू बनाए जाते थे और धार्मिक आयोजनों में भी इसका विशेष महत्व होता था। विशेषज्ञों के अनुसार चौलाई में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, फाइबर और कई आवश्यक खनिज तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे आज सुपरफूड की श्रेणी में रखा जा रहा है। पहाड़ के लोगों का मानना है कि चौलाई शरीर को ताकत देने के साथ-साथ लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखती है। खेतों में दिनभर काम करने वाले लोग चौलाई की रोटी और अन्य व्यंजन खाकर कठिन श्रम करते थे।
आज जब लोग मोटे अनाजों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब चौलाई की मांग लगातार बढ़ रही है। उत्तराखंड के गांवों में चौलाई का नाम आते ही सबसे पहले चौलाई के लड्डू याद आते हैं। गुड़ के साथ तैयार किए जाने वाले ये लड्डू केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि पौष्टिक भी होते हैं। मेले, त्योहार और धार्मिक आयोजनों में चौलाई के लड्डुओं की विशेष मांग रहती है। बचपन की यादों में आज भी गांव के बुजुर्ग चौलाई के मीठे लड्डुओं का स्वाद महसूस करते हैं।
पहाड़ों से बढ़ते पलायन का असर चौलाई की खेती पर भी पड़ा है, जिन खेतों में कभी चौलाई लहलहाती थी, उनमें से कई आज बंजर पड़े हैं। खेती से युवाओं के दूर होने और बाजार की कमी के कारण चौलाई का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि सरकार और विभिन्न संस्थाएं मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रही हैं। किसानों को चौलाई की व्यावसायिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि उनकी आय बढ़ सके।
आज चौलाई केवल गांवों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों से लेकर विदेशों तक इसकी मांग बढ़ रही है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग चौलाई का आटा, लड्डू, कुकीज और अन्य उत्पाद पसंद कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उत्तराखंड के किसान वैज्ञानिक तरीके से चौलाई की खेती करें और बेहतर बाजार उपलब्ध हो तो यह फसल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
चौलाई उत्तराखंड की उस समृ( विरासत का प्रतीक है, जिसने सदियों तक पहाड़ के लोगों को पोषण और ऊर्जा दी। आधुनिक जीवनशैली में जब लोग प्राकृतिक और पौष्टिक भोजन की तलाश कर रहे हैं, तब चौलाई एक बार फिर लोगों की थाली में सम्मान के साथ लौट रही है। यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि पहाड़ की मेहनत, आत्मनिर्भरता और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की कहानी है। चौलाई के हर दाने में उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू और पहाड़ के लोगों के संघर्ष की गाथा छिपी हुई है।
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