शनिवार, 13 जून 2026
‘मीडिया संवाद में संवाद गायब’
सवालों से दूरी या संवाद का नया माडल, भाजपा मुख्यालय के मीडिया संवाद पर उठे सवाल
पत्रकारों को बुलाया, उपलब्धियां सुनाई, राष्ट्रगान और कार्यक्रम समाप्त, कोई सवाल-जवाब नहीं
भाजपा मुख्यालय में आयोजित संवाद पर छिड़ी बहस, कांग्रेस बोली-प्रेस कान्फ्रेंस या प्रस्तुति सभा
देहरादून। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम अब राजनीतिक और पत्रकारिता जगत में चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम में पत्रकारों को आमंत्रित तो किया गया, लेकिन जिस तरह पूरा आयोजन संचालित हुआ, उसने संवाद और प्रेस कान्फ्रेंस की परंपराओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई। इसके बाद मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के 12 वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों को विस्तार से रखा। केंद्र सरकार की योजनाओं, विकास कार्यों और उपलब्धियों पर करीब एक घंटे तक प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान हुआ और आयोजन समाप्त घोषित कर दिया गया। लेकिन पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक जिस बात की चर्चा रही, वह थी पत्रकारों के सवालों के लिए मंच का न खुलना। आमतौर पर मीडिया संवाद या प्रेस वार्ता का उद्देश्य पत्रकारों और सत्ता पक्ष के बीच प्रत्यक्ष संवाद माना जाता है, जहां पत्रकार जनहित से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और सरकार या संगठन अपना पक्ष रखता है। लेकिन इस आयोजन में संवाद की जगह एकतरफा प्रस्तुति देखने को मिली।
राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि पत्रकारों को केवल उपलब्धियां सुनाने के लिए बुलाया जाए और उनसे सवाल पूछने का अवसर ही न दिया जाए, तो ऐसे कार्यक्रम का स्वरूप मीडिया संवाद कम और प्रचार कार्यक्रम अधिक प्रतीत होता है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना ग्रहण करने की नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने की भी होती है। पत्रकार जनता की ओर से सवाल पूछते हैं और यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत बनाती है। ऐसे में सवाल-जवाब का अभाव स्वाभाविक रूप से बहस को जन्म देता है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि सरकार और संगठन अपने कामकाज को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें पत्रकारों के सवालों से परहेज नहीं होना चाहिए। विपक्ष इसे संवाद से अधिक एकतरफा संप्रेषण की संज्ञा दे रहा है।
हालांकि भाजपा नेताओं का तर्क है कि कार्यक्रम का उद्देश्य प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियों को साझा करना था और यह एक विशेष प्रस्तुति थी, न कि पारंपरिक प्रेस कान्फ्रेंस। पार्टी का कहना है कि मीडिया के साथ नियमित रूप से संवाद और प्रेस वार्ताएं होती रहती हैं। फिर भी देहरादून में हुए इस आयोजन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या राजनीति में मीडिया संवाद का स्वरूप बदल रहा है? क्या प्रेस कान्फ्रेंस अब सवालों और जवाबों का मंच कम और उपलब्धियों के प्रस्तुतीकरण का माध्यम अधिक बनती जा रही हैं? लोकतंत्र में प्रेस और सत्ता के रिश्ते की मजबूती सवाल पूछने और जवाब देने की संस्कृति पर टिकी होती है। ऐसे में भाजपा मुख्यालय का यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मीडिया और राजनीति के बदलते संबंधों पर नई बहस की शुरुआत भी बन गया है।
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