मंगलवार, 23 जून 2026
‘भडूडू’ था पहाड़ की रसोई का राजा
इसमें पकती थी दाल और बसती थी पहाड़ की संस्कृति
कांसे का भडूडू केवल नहीं था दाल पकाने का एक बर्तन
पारिवारिक संस्कृति और लोक विरासत का जीवंत प्रतीक
गैस और प्रेशर कुकर के दौर में यह अनमोल धरोहर लुप्त
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवस्थल, नदियां और जंगल ही नहीं हैं, बल्कि यहां की पारंपरिक रसोई भी उतनी ही समृ( रही है। पहाड़ की रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का अपना अलग महत्व था। सिलबट्टा, ओखली, गंज्याली, तकली और तांबे-पीतल के बर्तनों की तरह ही भडूडू भी हर घर की शान हुआ करता था। आज की पीढ़ी शायद इस नाम से परिचित भी न हो, लेकिन कुछ दशक पहले तक पहाड़ के लगभग हर घर में कांसे का बना भडूडू जरूर होता था। यह विशेष रूप से दाल पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। माना जाता था कि भडूडू में बनी गहत, भट्ट, मसूर, उड़द या राजमा की दाल का स्वाद किसी अन्य बर्तन में नहीं आ सकता।
भडूडू केवल भोजन बनाने का साधन नहीं था, बल्कि वह पहाड़ की रसोई का ऐसा साथी था, जिसने पीढ़ियों तक हजारों परिवारों के भोजन को स्वाद और पौष्टिकता से भर दिया। भडूडू कांसे का मोटा और मजबूत बर्तन होता था। इसका निचला हिस्सा गोल और गहरा होता था, जिससे आग की गर्मी पूरे बर्तन में समान रूप से फैलती थी। ऊपर का मुंह अपेक्षाकृत छोटा होता था, जिससे भाप लंबे समय तक भीतर बनी रहती थी और दाल धीरे-धीरे गलती थी। लकड़ी के चूल्हे पर भडूडू को रखा जाता था। नीचे चीड़, बांज, बुरांश या अन्य सूखी लकड़ियां जलती रहती थीं और ऊपर दाल घंटों तक धीमी आंच पर पकती रहती थी।
सुबह-सुबह महिलाएं गहत, भट्ट या मसूर की दाल को धोकर भडूडू में डालती थीं। उसमें पानी, हल्दी और थोड़ा नमक मिलाकर चूल्हे पर चढ़ा दिया जाता था। इसके बाद दाल को जल्दी पकाने की कोई जल्दबाजी नहीं होती थी। दाल धीरे-धीरे उबलती रहती थी। बीच-बीच में उसे लकड़ी के कलछुल से चलाया जाता था। जब दाल पूरी तरह गल जाती, तब उसमें जाखिया, जीरा, लहसुन, सूखी लाल मिर्च और देसी घी का तड़का लगाया जाता था। घर के बुजुर्ग कहते थे कि दाल जितनी धीरे पकेगी, स्वाद उतना ही गहरा होगा।
पहाड़ के लोग मानते थे कि भडूडू में बनी दाल का स्वाद अलग ही होता था। इसके पीछे कांसे का बर्तन गर्मी को संतुलित रखता था। लकड़ी की धीमी आंच दाल को समान रूप से पकाती थी। दाल जल्दी नहीं गलती थी, बल्कि धीरे-धीरे अपना प्राकृतिक स्वाद छोड़ती थी। धुएं की हल्की खुशबू भोजन में अलग सुगंध भर देती थी। यही कारण था कि आज भी बुजुर्ग कहते हैं कि गैस और प्रेशर कुकर में बनी दाल पेट भर सकती है, लेकिन भडूडू वाली दाल मन भर देती थी।
आयुर्वेद में कांसे के बर्तनों का विशेष महत्व बताया गया है। ग्रामीण समाज का मानना था कि कांसे के बर्तन में पका भोजन अधिक सुपाच्य होता है। पहाड़ के लोग इसे किसी वैज्ञानिक सि(ांत के रूप में नहीं, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर मानते थे। गहत, भट्ट और उड़द जैसी पौष्टिक दालें जब भडूडू में पकती थीं तो वह लंबे समय तक गर्म भी रहती थीं और उनका स्वाद भी बना रहता था।
पहाड़ के पुराने घरों में रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती थी। जब भडूडू चूल्हे पर चढ़ा होता था, तब पूरा परिवार उसके आसपास बैठता था। बच्चे गृहकार्य करते थे। बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते थे। महिलाएं ऊन कातती थीं। पुरुष खेत-खलिहान की बातें करते थे। यानी भडूडू के साथ केवल दाल नहीं पकती थी, बल्कि परिवार भी साथ बैठता था। पहाड़ में बेटी की विदाई के समय उसे तांबे और कांसे के बर्तनों के साथ भडूडू भी दिया जाता था। इसे गृहस्थी की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। कई परिवार आज भी अपने पूर्वजों का भडूडू संभालकर रखते हैं। यह केवल बर्तन नहीं, बल्कि परिवार की विरासत माना जाता है।
समय बदला, लकड़ी के चूल्हों की जगह गैस ने ले ली। प्रेशर कुकर ने घंटों पकने वाली दाल को कुछ मिनटों में तैयार कर दिया। स्टील और नॉन-स्टिक बर्तनों का चलन बढ़ गया। धीरे-धीरे भडूडू रसोई से गायब होने लगा। आज गांवों में भी बहुत कम घर ऐसे हैं, जहां नियमित रूप से भडूडू का इस्तेमाल होता हो। लोक संस्कृति के जानकार मानते हैं कि यदि पारंपरिक रसोई से जुड़े बर्तनों को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में ही इन्हें देख पाएंगी। ग्रामीण पर्यटन, होम-स्टे और पारंपरिक पहाड़ी भोजन के माध्यम से भडूडू को फिर से पहचान दिलाई जा सकती है। यदि पर्यटकों को भडूडू में बनी गहत या भट्ट की दाल परोसी जाए तो यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दे सकता है।
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती, बल्कि उसकी रसोई में भी जीवित रहती है। भडूडू उसी संस्कृति का एक ऐसा अध्याय है, जो धीरे-धीरे बंद होता जा रहा है। यदि हम अपनी अगली पीढ़ी को पहाड़ की असली पहचान से जोड़ना चाहते हैं, तो हमें केवल व्यंजन ही नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले पारंपरिक बर्तनों और उनसे जुड़ी जीवनशैली को भी सहेजना होगा। क्योंकि भडूडू में पकने वाली दाल केवल भोजन नहीं थी, वह पहाड़ की आत्मा का स्वाद थी।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें