बुधवार, 3 जून 2026
आखिर कौन है असली उत्तराखंडी’
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-25
मूल निवास, भू-कानून और क्षेत्रीय अस्मिता पर सिमट सकता है सियासी विमर्श
---राज्य आंदालन की मूल भावना को फिर से मिल रही है आवाज
---विकास के साथ अस्मिता भी बनेगी इस बार विस चुनाव में मुद्दा
---पलायन, जमीन व सांस्कृतिक अस्तित्व के मुद्दों पर बढे़गा दबाव
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, प्रदेश की राजनीति में पहचान और अस्मिता का मुद्दा केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मूल निवास, सशक्त भू-कानून, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार में प्राथमिकता और पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को बचाने की मांग लगातार मजबूत हुई है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब विकास के साथ-साथ पहचान आधारित मुद्दों पर भी अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना में भी क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार का प्रश्न शामिल था। राज्य गठन के इतने साल बाद भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि उनकी अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं। विशेषकर पहाड़ी जिलों में पलायन, भूमि खरीद की बढ़ती प्रवृत्ति और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर चिंताएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। प्रदेश में मूल निवास 1950 की मांग और मजबूत भू-कानून को लेकर कई सामाजिक संगठनों ने आंदोलन किए हैं। इन आंदोलनों ने युवाओं और प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच भी व्यापक समर्थन हासिल किया है। यही कारण है कि राजनीतिक दल इन मुद्दों को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं।
भाजपा सरकार ने समान नागरिक संहिता, भू-कानून में संशोधन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे कदमों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीं कांग्रेस सरकार को घेरते हुए यह सवाल उठा रही है कि राज्य आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सड़क, बिजली और पानी तक सीमित नहीं रहेगा। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में स्थानीय पहचान, रोजगार में स्थानीय युवाओं की भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि चुनाव में विकास, महिला मतदाता, अनुसूचित जाति वोट बैंक और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, लेकिन पहचान का प्रश्न इन सभी मुद्दों को जोड़ने वाला साझा राजनीतिक सूत्र बन सकता है।
भाजपा का दावा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को मजबूत करने के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए हैं। पार्टी इन उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। वही कांग्रेस का कहना है कि पहचान केवल नारों से नहीं बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार सुनिश्चित करने से मजबूत होगी। पार्टी इन सवालों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है।
उत्तराखंड राज्य का गठन पहाड़ के पानी और पहाड़ की जवानी को बचाने के संकल्प के साथ हुआ था। लेकिन आज राज्य की जनता के सामने दो बड़े संकट हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बाहरी लोग आकर पहाड़ों में अंधाधुंध जमीनें खरीद रहे हैं, जिससे डेमोग्राफी बदल रही है। लोग हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग कर रहे हैं, ताकि कृकृषि और आवासीय जमीनों को सुरक्षित रखा जा सके। इसके आंदोलनकारियों की मांग है कि राज्य में नौकरियों और अन्य संसाधनों पर पहला हक उनका हो जिनके पूर्वज 1950 से यहां रह रहे हैं, न कि उनका जो कुछ साल पहले आकर बस गए हैं।
2027 का चुनाव विकास के दावों बनाम क्षेत्रीय अस्मिता के बीच लड़ा जा सकता है और जो भी दल पहाड़ के युवाओं को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहेगा कि वह उनकी जमीन और नौकरी की रक्षा कर सकता है, सत्ता की चाबी उसी के पास जाएगी। 2027 के उत्तराखंड चुनाव केवल इस बात पर तय नहीं होंगे कि कितनी सड़कें बनीं या कितने रोजगार मिले, बल्कि इस बात पर भी तय होंगे कि उत्तराखंड का भविष्य किसके हाथों में सुरक्षित है।
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