सोमवार, 29 जून 2026
गांव छूटा, बचपन रूठा और पीछे छूट गया ‘किनगोड़’
अब बस यादों में ही ताज़ा है ‘किनगोड़’ का जाना-पहचाना स्वाद
स्कूल से लौटते ही किनगोड़ की झाड़ियों में ढूँढते थे हम खुशियाँ
बच्चों की जेब में भर जाता था किनगोड़, आज नई पीढ़ी इससे दूर
देहरादून। पहाड़ के जंगलों, गांवों के किनारों और खेतों के आसपास उगने वाला किनगोड़ जंगली फल कभी ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। गर्मियों और बरसात के मौसम में बच्चे स्कूल से लौटते समय किनगोड़ तोड़कर खाते थे और इसकी खट्टी-मीठी स्वादिष्टता उनके बचपन की यादों में आज भी ताजा है। एक कांटेदार झाड़ी में लगने वाला छोटा फल है, जो गहरे बैंगनी, लाल या काले रंग का होता है। यह फल मुख्य रूप से पहाड़ के मध्यम और ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगता है। गांवों के आसपास इसकी झाड़ियां आसानी से देखी जा सकती हैं। स्थानीय भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, लेकिन गढ़वाल और कुमाऊं में यह किनगोड़ के नाम से ज्यादा जाना जाता है।
किनगोड़ का स्वाद खट्टा-मीठा होता है। पकने के बाद इसमें हल्की मिठास आ जाती है, जबकि कच्चे फलों में खटास अधिक होती है। यही कारण है कि बच्चे और ग्रामीण इसे बड़े चाव से खाते हैं। कई जगहों पर इससे चटनी, जैम और शरबत भी बनाया जाता है। पहाड़ के बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के अनुसार किनगोड़ केवल स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि औषधीय गुणों का भंडार भी है। इसमें कई प्रकार के पोषक तत्व और एंटीआक्सीडेंट पाए जाते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक,पाचन तंत्र को मजबूत करने में मददगार, आंखों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक, शरीर में ऊर्जा और ताजगी बनाए रखने में सहायक होता था। इसमें प्राकृतिक एंटीआक्सीडेंट होने के कारण यह कई बीमारियों से बचाव में मदद करता है।
पारंपरिक चिकित्सा प(तियों में इसकी जड़ों और तनों का भी उपयोग किया जाता रहा है। किनगोड़ केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पहाड़ के अनेक पक्षियों और छोटे वन्य जीवों के लिए भी भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके फल पकने पर कई पक्षी इसकी झाड़ियों पर मंडराते दिखाई देते हैं। इस प्रकार यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज की नई पीढ़ी पैकेटबंद खाद्य पदार्थों और बाजारू फलों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है। इसके चलते पहाड़ की पारंपरिक खाद्य संस्कृति धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है। कई बच्चे अब किनगोड़, हिसालू, काफल और मेहल जैसे जंगली फलों के नाम तक नहीं जानते।
वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन पारंपरिक फलों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी इस प्राकृतिक धरोहर से वंचित हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार किनगोड़ से जैम, जूस, सिरप और हर्बल उत्पाद तैयार कर स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। यदि इसके वैज्ञानिक उत्पादन और विपणन पर ध्यान दिया जाए तो यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकता है।
किनगोड़ केवल एक जंगली फल नहीं, बल्कि पहाड़ के बचपन, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी यादों का हिस्सा है। यह हमें उस दौर की याद दिलाता है जब बच्चों के हाथों में चिप्स के पैकेट नहीं, बल्कि जंगलों से तोड़े गए किनगोड़ और काफल होते थे। पहाड़ की इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है, ताकि पहाड़ का यह खट्टा-मीठा स्वाद आने वाले वर्षों तक जीवित रह सके।
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