मंगलवार, 30 जून 2026
‘वजूद’ की जंग लड़ रही ‘यूकेडी’
क्षेत्रीय दल ने अलग राज्य की लड़ाई को पहुंचाया था जन-जन तक
एकमात्र क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने को है मजबूर
शुरुआती मजबूत उपस्थिति के बाद आई थी यूकेडी में आंतरिक फूट
लगातार टूट व बड़े राष्ट्रीय दलों के प्रभाव से कमजोर पड़ गया जनाधार
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के बीच प्रदेश का एकमात्र क्षेत्रीय दल, उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश में जुट गया है, जिस दल ने अलग उत्तराखंड राज्य की लड़ाई को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई, वही दल आज अपने राजनीतिक अस्तित्व और प्रासंगिकता की चुनौती से जूझ रहा है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की कोख से निकले यूकेडी को कभी पहाड़ की अस्मिता, क्षेत्रीय पहचान और उत्तराखंडियों की आवाज के रूप में देखा जाता था। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में पार्टी ने विधानसभा में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई और प्रदेश की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ आंतरिक कलह, लगातार टूट-फूट और बड़े दलों के बढ़ते प्रभाव ने यूकेडी के जनाधार को कमजोर कर दिया।
आगामी विधानसभा चुनाव में यूकेडी एक बार फिर राज्य आंदोलन की विरासत और मूल मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। पार्टी स्थानीय लोगों के अधिकार, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, बेरोजगारी, पलायन और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनता के हक जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति बना रही है। यूकेडी नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड राज्य का सपना केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं देखा गया था, बल्कि एक ऐसे राज्य के निर्माण के लिए था, जहां पहाड़ की जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनें और स्थानीय लोगों को प्राथमिकता मिले। पार्टी का आरोप है कि राज्य गठन के बाद सत्ता में रही राष्ट्रीय पार्टियां उत्तराखंड आंदोलन की मूल भावना को पूरा करने में असफल रही हैं।
वर्तमान में यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया हुआ जनाधार वापस हासिल करने की है। प्रदेश की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमट गई है, जिससे क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक स्पेस लगातार कम हुआ है। युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग यूकेडी के संघर्ष और राज्य आंदोलन में उसकी भूमिका से बहुत अधिक परिचित नहीं है। ऐसे में पार्टी के सामने अपनी विचारधारा और प्रासंगिकता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की भी चुनौती है।
हाल के वर्षों में भू-कानून, मूल निवास, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों ने प्रदेश में क्षेत्रीय अस्मिता की बहस को फिर से तेज किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यूकेडी इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच ले जाने में सफल रहती है, तो वह एक बार फिर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज करा सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में समय-समय पर तीसरे विकल्प की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। यूकेडी इसी राजनीतिक रिक्तता को भरने का प्रयास कर रही है। हालांकि पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने, युवा नेतृत्व को आगे लाने और जनता के मुद्दों को आंदोलन का रूप देने में कितनी सफल होती है।
विधानसभा चुनाव की दस्तक के बीच एक सवाल फिर प्रदेश की राजनीति में गूंज रहा हैकृक्या उत्तराखंड आंदोलन में आगे रही यूकेडी अपने पुराने गौरव को हासिल कर पाएगी, या फिर क्षेत्रीय राजनीति का यह अध्याय केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगा?
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