बुधवार, 10 जून 2026
‘चौंसू’ है हजारों साल पुरानी पहाड़ी ‘विरासत’
‘चौंसू’ की सोंधी खुशबू और लोहे की कढ़ाई के जादू की दीवानगी
पहाड़ की थाली का स्वाद, परंपरा और सेहत का अनमोल संगम है चौंसू
काली उड़द की दाल को भूनकर तैयार होने वाली चौंसू रसोई का हिस्सा
हर उत्तराखंडी के खून और यादों में बसा है चौंसू का वह सोंधा स्वाद
देहरादून। पहाड़ की कड़कड़ाती ठंड हो या सावन की रिमझिम फुहार, उत्तराखंड के घरों में जब लोहे की कढ़ाई में चौंसू पकता है, तो उसकी सोंधी खुशबू पूरे मोहल्ले को बता देती है कि आज रसोई में कुछ खास बन रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के पारंपरिक खान-पान का राजा चौंसू सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, सेहत और यादों का एक खूबसूरत हिस्सा है।
चौंसू बनाने के लिए सबसे पहले काली उड़द की दाल को हल्का भून लिया जाता है। इसके लिए साबुत या छिलके वाली काली उड़द की दाल को धीमी आंच पर तवे या कढ़ाई में तब तक भूना जाता है, जब तक कि उसमें से एक सोंधी सी महक न आने लगे। भूनने के बाद इस दाल को सिल-बट्टे पर दरदरा पीसा जाता है। चौंसू हमेशा लोहे की कढ़ाई में ही बनाया जाता है। लोहे की कढ़ाई में पकने के कारण इसका रंग गाढ़ा काला-भूरा हो जाता है और इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इसके बाद शुरू होता है इसे पकाने का पारंपरिक तरीका। सरसों के तेल में जख्या या जीरे का तड़का लगाया जाता है। फिर पिसी हुई दाल को मसाले और हींग के साथ भूनकर पानी डाला जाता है। इसे धीमी आंच पर देर तक पकाया जाता है। जैसे-जैसे चौंसू उबलता है, इसकी तरी गाढ़ी और मखमली होती जाती है।
पहाड़ की महिलाएं आज भी मानती हैं कि असली चौंसू वही है जो लकड़ी के चूल्हे पर धीमी आंच में पकाई जाए। इससे इसका स्वाद और सुगंध कई गुना बढ़ जाती है। चौंसू स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी मानी जाती है। काली उड़द प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और फाइबर से भरपूर होती है। पहाड़ के कठिन भौगोलिक जीवन में लोगों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए यह व्यंजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके साथ ही चौंसू शरीर को ताकत देने के साथ पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है। यही कारण है कि पुराने समय में खेतों में काम करने वाले लोग इसे विशेष रूप से पसंद करते थे।
उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से दूर होते जा रहे हैं। बावजूद इसके चौंसू आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। शहरों में रहने वाले उत्तराखंडी परिवार भी अपने बच्चों को पहाड़ के स्वाद और संस्कृति से जोड़ने के लिए चौंसू बनाना नहीं भूलते। आज सोशल मीडिया और पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के कारण उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों की चर्चा देशभर में हो रही है। चौंसू भी अब केवल गांवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहाड़ी व्यंजनों की पहचान बनकर नए लोगों को आकर्षित कर रही है।
स्थानीय होटल और होमस्टे संचालक भी अपने मेन्यू में चौंसू को शामिल कर रहे हैं, ताकि पर्यटक पहाड़ के असली स्वाद का अनुभव कर सकें।
उत्तराखंड में एक कहावत जैसी है कि चौंसू का मजा तब तक अधूरा है, जब तक थाली में गरमा-गरम भात न हो। घी की एक चम्मच, हरी मिर्च और ककड़ी का पहाड़ी पिस्यूं लूण इसके स्वाद में चार चांद लगा देते हैं। दोपहर के धूप में बैठकर चौंसू-भात खाने का आनंद किसी फाइव-स्टार होटल के खाने से कहीं बढ़कर है।
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