मंगलवार, 2 जून 2026
आस्था’ की पिच पर होगा ‘सियासी’ मैच
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-23
यूसीसी, डेमोग्राफी चेंज और सख्त भू-कानून के इर्द-गिर्द घूमेगी सूबे की सियासत
---चारधाम यात्रा, मंदिर कारिडोर और धार्मिक पर्यटन पर बढ़ेगी सियासी बहस
---हिंदुत्व बनाम स्थानीय मुद्दों के बीच चुनावी रणनीति तैयार करने में जुटे दल
---संत समाज, तीर्थ पुरोहित और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी रहेगी अहम
देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। राज्य की राजनीति में इस बार धर्म और आस्था का मुद्दा प्रमुख चुनावी एजेंडा बन सकता है। चारधाम यात्रा, मंदिरों के विकास, धार्मिक पर्यटन, सनातन संस्कृति और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर भाजपा और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं।
प्रदेश में लंबे समय से धार्मिक आस्था राजनीति का अहम हिस्सा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ धाम पुनर्निर्माण, बद्रीनाथ मास्टर प्लान, मानसखंड और मंदिर कारिडोर जैसी परियोजनाओं ने इस मुद्दे को और अधिक प्रभावी बना दिया है। भाजपा इन विकास कार्यों को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस स्थानीय समस्याओं, पलायन, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों को केंद्र में रखकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड की धार्मिक पहचान और तीर्थाटन आधारित अर्थव्यवस्था को देखते हुए धर्म आधारित राजनीति का असर पहाड़ से लेकर मैदान तक दिखाई दे सकता है। खासकर गढ़वाल क्षेत्र में चारधाम यात्रा और मंदिर विकास कार्य चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा जहां खुद को सनातन संस्कृति का संरक्षक बताने में जुटी है, वहीं विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि धार्मिक परियोजनाओं के बावजूद आम लोगों की आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ।
संत समाज और धार्मिक संगठनों की भूमिका भी चुनाव में अहम मानी जा रही है। चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं, तीर्थ पुरोहितों के अधिकार और मंदिर समितियों से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक दल अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को भी भाजपा चुनावी विमर्श में शामिल कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तराखंड में धार्मिक आस्था लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ी हुई है। ऐसे में चुनावी सभाओं से लेकर सोशल मीडिया अभियान तक धर्म आधारित संदेशों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि केवल धार्मिक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, क्योंकि जनता रोजगार, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर भी जवाब चाहती है।
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कांग्रेस की डायवर्जन पालिटिक्स
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने धर्म की इस पिच पर सीधे उतरने का जोखिम है। इसलिए, कांग्रेस की रणनीति इस मुद्दे को सीधे खारिज करने के बजाय इसे डायवर्जन पालिटिक्स करार देने की है। विपक्ष अखबारों और सोशल मीडिया के जरिए अंकिता भंडारी मामले, केदारनाथ में सोने की चोरी के आरोप और भर्ती घोटालों को अभी से हवा दे रहा है ताकि चुनाव को वापस जनता के बुनियादी मुद्दों पर लाया जा सके। सत्तापक्ष चारधाम कारिडोर और केदारनाथ-बद्रीनाथ के पुनरुत्थान को अपनी धार्मिक प्रतिब(ता से जोड़ रहा है, वहीं स्थानीय युवाओं और क्षेत्रीय संगठनों का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर अभियान चला रहा है कि अगर देवभूमि को बचाना है, तो हिमाचल की तर्ज पर सख्त भू-कानून लागू करो। विपक्ष इस जनभावना को भांप चुका है और वह धर्म के मुकाबले जमीन और हक-हकूक का कार्ड खेलने की फिराक में है।
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