मंगलवार, 2 जून 2026

पहाड़ का पारंपरिक ज़ायका है आलू की ‘थिचवाणी’

---पहाड़ की रसोई की शान इसके स्वाद में बसती है लोक संस्कृति की मिठास ---गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन ---सादगी, स्वाद और पौष्टिकता का अनूठा संगम है आलु की थिचवाणी ---गांव की रसोई से अब शहरों और पर्यटन स्थलों तक बढ़ गई है इसकी पहचान देहरादून। उत्तराखंड की पारंपरिक खानपान संस्कृति अपने अनोखे स्वाद और सादगी के लिए देशभर में जानी जाती है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक खास नाम है आलू की थिचवाणी जो पहाड़ की रसोई की पहचान मानी जाती है। कम मसालों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी गांवों में उतना ही लोकप्रिय है, जितना वर्षों पहले हुआ करता था। पहाड़ की जीवनशैली, मौसम और स्थानीय स्वाद का अद्भुत मेल थिचवाणी में देखने को मिलता है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में बनने वाली थिचवाणी का स्वाद थोड़ा अलग हो सकता है, लेकिन इसकी आत्मा एक जैसी ही रहती है। उबले हुए आलुओं को हाथों से दबाकर या कूटकर तैयार किया जाता है, जिसके बाद उसमें टमाटर, हरी मिर्च, जाखिया, धनिया और पारंपरिक मसालों का तड़का लगाया जाता है। पहाड़ के लोग इसे मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या चावल के साथ बड़े चाव से खाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने समय में जब लोग खेतों और जंगलों में मेहनत करते थे, तब जल्दी बनने वाला पौष्टिक भोजन बेहद जरूरी होता था। ऐसे में थिचवाणी सबसे आसान और स्वादिष्ट विकल्प मानी जाती थी। कम संसाधनों में बनने वाला यह व्यंजन आज भी ग्रामीण जीवन की सादगी को जीवित रखे हुए है। पारंपरिक पहाड़ी भोजन स्वास्थ्य की दृदृष्टि से भी बेहद लाभकारी है। आलू की थिचवाणी में स्थानीय मसालों और कम तेल का प्रयोग इसे हल्का और पौष्टिक बनाता है। यही कारण है कि अब होटल और होमस्टे संचालक भी पर्यटकों को पारंपरिक उत्तराखंडी थाली में थिचवाणी परोसने लगे हैं। उत्तराखंड में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच पारंपरिक व्यंजनों को बचाए रखने की जरूरत महसूस की जा रही है। कई सामाजिक संगठन और महिला समूह स्थानीय खानपान को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रहे हैं। उनका मानना है कि पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन केवल भोजन नहीं बल्कि यहां की संस्कृति, लोकजीवन और पहचान का हिस्सा हैं। आज आलू की थिचवाणी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मीयता और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक बन चुकी है। गांव की मिट्टी से जुड़ा यह स्वाद लोगों को अपनी जड़ों की याद दिलाता है।

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