रविवार, 7 जून 2026

पहाड़ में ‘रिसोर्स’ नहीं, मां के रूप में है ‘प्रकृति’

जब तक पहाड़ की जीवनशैली जिंदा रहेगी तब तक सुरक्षित रहेगा पर्यावरण क्रासर ---पहाड़ के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं जीवन का है हिस्सा ---पहाड़ के गांवों में लोग जीते आ रहे हैं सदियों से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जीवन ---पहाड़ के लोग केवल पर्यावरण के उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े संरक्षक देहरादून। आज दुनिया पर्यावरण संरक्षण के लिए नई तकनीकों और नीतियों पर अरबों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन पहाड़ के लोगों ने बिना किसी बड़े बजट और प्रचार के सदियों तक जंगल, पानी और जैव विविधता को बचाकर रखा। उनकी जीवनशैली, परंपराएं और प्रकृति के प्रति सम्मान ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे प्रभावी माडल है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में पर्यावरण संरक्षण कोई सरकारी योजना या अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा रहा है। यहां जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, नदियां केवल पानी का माध्यम नहीं हैं और पहाड़ केवल भूमि का टुकड़ा नहीं हैं। यहां प्रकृति को मां, देवता और जीवनदाता के रूप में देखा जाता है। आज जब जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं, तब पहाड़ के लोगों का जीवन दर्शन दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश देता हैकृप्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सामंजस्य ही विकास का आधार होना चाहिए। उत्तराखंड में अनेक जंगल, जलस्रोत और पर्वत धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। गांवों के आसपास बने देववन और बुग्याल केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं बल्कि सामुदायिक संरक्षण के उदाहरण हैं। वर्षों तक लोगों ने इन्हें अपनी आस्था और परंपराओं के माध्यम से सुरक्षित रखा। ग्रामीण समाज में पेड़ों को काटने से पहले अनुमति लेने, जलस्रोतों को साफ रखने और जंगलों के संरक्षण की परंपरा आधुनिक पर्यावरणीय कानूनों से कहीं पहले से मौजूद रही है। जब पर्यावरण संरक्षण की बात होती है तो उत्तराखंड का नाम स्वतः सामने आ जाता है। 1970 के दशक में हुआ चिपको आंदोलन केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि प्रकृति और समाज के रिश्ते का प्रतीक था। गांव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर जंगलों को बचाने का जो संदेश दिया, उसने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का नया रास्ता दिखाया। यह आंदोलन साबित करता है कि पहाड़ के लोग जंगलों को संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते हैं। विडंबना यह है कि जिन लोगों ने सदियों तक जंगलों और जलस्रोतों की रक्षा की, आज वही लोग पलायन के कारण गांव छोड़ने को मजबूर हैं। खाली होते गांवों के साथ पारंपरिक संरक्षण व्यवस्था भी कमजोर हो रही है। कई स्थानों पर जलस्रोत सूख रहे हैं, खेती की जमीन बंजर हो रही है और जंगलों की निगरानी कम होती जा रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहाड़ को बचाना है तो पहाड़ के लोगों को गांवों में टिकाए रखना होगा। सड़क, बिजली, पर्यटन और आधारभूत सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य में बड़े संकट पैदा कर सकता है। हाल के वर्षों में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने यह संकेत दिया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों का अनुभव और पारंपरिक ज्ञान इस संतुलन को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हिमालय को बचाने की लड़ाई केवल पेड़ों और नदियों को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों को बचाने की लड़ाई भी है जिन्होंने पीढ़ियों तक प्रकृति की रक्षा की है। यदि पहाड़ के गांव जीवित रहेंगे, तो जंगल भी सुरक्षित रहेंगे, जलस्रोत भी बहते रहेंगे और हिमालय की आत्मा भी जीवित रहेगी। पर्यावरण के सबसे सच्चे रक्षक आज भी पहाड़ के लोग ही हैं।

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