शनिवार, 13 जून 2026
‘कंक्रीट’ के जंगलों में गुम हो गई ‘मंडुए की रोटी’ की खुशबू
मंडुए की रोटी में था पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और मां के हाथों का स्वाद
पिज्जा-बर्गर के दौर में मंडुए की रोटी हमारे पहाड़ की है असली पहचान
कभी थी मजबूरी की थाली, आज दुनिया के लिए है सेहत का खजाना
देहरादून। जब पहाड़ की सुबह धूप की पहली किरणों के साथ जागती है, जब दूर कहीं गौशाला से आती घंटियों की आवाज और चूल्हे में जलती लकड़ियों की खुशबू गांव की हवा में घुलती थी, तब पहाड़ की रसोई में एक ऐसी खुशबू फैलती है, जो सिर्फ भूख नहीं मिटाती बल्कि यादों को भी जगा देती है। यह खुशबू होती है मंडुए की रोटी की। लोहे के तवे पर सिकती काली-सुनहरी मंडुए की रोटी, ऊपर से लगाया गया घर का घी और साथ में भांग की चटनी, गहत की दाल या पहाड़ी सब्जी यह सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, मेहनत और आत्मनिर्भर जीवनशैली की पहचान है।
पहाड़ के गांवों में आज भी कई घरों की सुबह मंडुए की रोटी से शुरू होती है। बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में मंडुए का आटा आते ही जैसे पुरानी यादें जीवंत हो उठती हैं। आटे को गूंथने से लेकर गोल रोटी बनाने तक हर प्रक्रिया में पहाड़ की परंपरा बसती है। कई लोगों के लिए मंडुए की रोटी का स्वाद बचपन की उन सुबहों की याद है, जब मां चूल्हे के पास बैठकर रोटियां सेंकती थीं और बच्चे स्कूल जाने से पहले गरम-गरम रोटी खाकर निकलते थे। आज जब शहरों की भागदौड़ में लोग पैकेट बंद भोजन की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पहाड़ की यह साधारण सी रोटी अपने भीतर प्रकृति और अपनापन समेटे हुए है।
एक समय था जब मंडुआ पहाड़ के गरीब और मेहनतकश लोगों का मुख्य भोजन माना जाता था। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जहां गेहूं और चावल की खेती आसान नहीं थी, वहां मंडुआ किसानों का सहारा बना। कम पानी में भी उगने वाली यह फसल पहाड़ के किसानों की जीवनरेखा रही। खेतों में मेहनत करने वाले लोग मंडुए की रोटी खाकर दिनभर पहाड़ की चढ़ाई और कठिन काम करते थे। लेकिन समय बदला, जिस मंडुए को कभी पिछड़ेपन की निशानी माना जाता था, वही आज पोषण और स्वास्थ्य के कारण दुनिया भर में पहचान बना रहा है।
बता दें कि मंडुआ पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। इसमें फाइबर, कैल्शियम और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही वजह है कि आज शहरों में भी लोग पारंपरिक अनाजों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए मंडुआ कोई नया फैशन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा है। मंडुए की रोटी की कहानी सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है। इसके पीछे किसान की मेहनत, पहाड़ की मिट्टी और महिलाओं का संघर्ष छिपा है।
गांव की महिलाएं मंडुआ बोने से लेकर उसे काटने, सुखाने और पीसने तक की पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पहले घरों में हाथ की चक्की से मंडुआ पीसा जाता था, जिसकी खुशबू आज भी बुजुर्गों को पुराने दिनों की याद दिलाती है। पलायन के कारण पहाड़ के कई गांव खाली हो गए, खेत बंजर होने लगे, लेकिन मंडुए ने अपनी जगह नहीं छोड़ी। आज भी कई गांवों में बुजुर्ग अपने खेतों में मंडुआ उगाते हैं और नई पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
मंडुए की रोटी हमें याद दिलाती है कि पहाड़ की असली ताकत सिर्फ ऊंचे पहाड़ और नदियां नहीं, बल्कि वहां के लोगों की मेहनत और उनकी सादगी भी है। मंडुए की रोटी का स्वाद शब्दों में बांधना आसान नहीं। इसमें पहाड़ की ठंडी हवा है, खेतों की मिट्टी की खुशबू है, मां के हाथों का प्यार है और उस जीवन का एहसास है, जिसमें कम साधनों में भी खुशियां भरपूर थीं। आज भले ही बड़े शहरों में लोग इसे स्वास्थ्य के नाम पर अपना रहे हैं, लेकिन पहाड़ के लिए मंडुए की रोटी हमेशा से भावनाओं की रोटी रही है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें