रविवार, 7 जून 2026

उच्यणू है ‘अनहोनी’ का ‘पहाड़ी’ इलाज

जब आधुनिक दवाएं भी हार मान लें, वहां उम्मीद की आखिरी किरण जगाती है देवभूमि की यह थाती लंबी बीमारी हो या अचानक आया कोई बड़ा संकट ‘उच्यणू’ की एक पोटली में छिपी होती है सुकून की उम्मीद संकट के वक्त जब समझ न आए कोई रास्ता, तब ईष्ट देवों के आगे शीश नवाकर ऐसे रखा जाता है उच्यणू आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी उत्तराखंड के कई गांवों में जीवित है यह अनोखा लोकविश्वास लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक विश्वास का अनूठा संगम है पहाड़ की अनोखी परंपरा देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी ऐसी अनेक परंपराएं जीवित हैं, जो आधुनिकता की तेज रफ्तार के बावजूद लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है ‘उच्यणू’। जब किसी व्यक्ति की बीमारी लंबे समय तक ठीक नहीं होती, परिवार पर लगातार संकट आते हैं या किसी अनहोनी का कारण समझ नहीं आता, तब गांवों में आज भी उच्यणू रखा जाता है। गढ़वाल और कुमाऊं के अनेक ग्रामीण इलाकों में प्रचलित यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। लोगों का विश्वास है कि कभी-कभी कुलदेवता, ग्रामदेवता या स्थानीय देवी-देवताओं के रूठ जाने से परिवार पर संकट आ सकता है। ऐसे में देवताओं की इच्छा और नाराजगी का कारण जानने के लिए उच्यणू आयोजित किया जाता है। उच्यणू के दौरान गांव के जागरिया, पश्वा या देववक्ता को बुलाया जाता है। ढोल-दमाऊं और मंत्रोच्चारण के बीच देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। लोकमान्यता है कि इस प्रक्रिया में देवता पश्वा पर अवतरित होकर परिवार की समस्या का कारण बताते हैं और उसके समाधान का मार्ग भी सुझाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब उच्यणू सामाजिक और मानसिक सहारे का माध्यम भी था। बीमारी के दौरान पूरा गांव एक परिवार के साथ खड़ा होता था। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनते थे और सामूहिक रूप से समाधान खोजने का प्रयास करते थे। समाजशास्त्रियों के अनुसार उच्यणू केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। इसके माध्यम से लोकपरंपराएं, लोकसंगीत, लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं। हालांकि नई पीढ़ी के बीच वैज्ञानिक सोच और आधुनिक चिकित्सा के प्रसार के कारण इस परंपरा का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है, फिर भी दूरस्थ गांवों में उच्यणू आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कई परिवार आधुनिक उपचार के साथ-साथ देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए भी इस परंपरा का सहारा लेते हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में उच्यणू केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पहाड़ के उस जीवन दर्शन का हिस्सा है जिसमें प्रकृति, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए माने जाते हैं। बदलते समय में भी यह परंपरा पहाड़ की लोकआस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य कर रही है।

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