बुधवार, 15 जुलाई 2026
3000 पेड़ों के लिए ‘जेन जी’ सड़क पर उतरी
उत्तराखंड में पर्यावरण बनाम विकास की नई जंग
युवाओं ने कहाकृ-जंगल बचेंगे, तभी भविष्य बचेगा
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंच गया आंदोलन
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और समाज में इन दिनों एक नया आंदोलन आकार ले रहा है। यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उस नई पीढ़ी का है जिसे अक्सर मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित मान लिया जाता है। करीब 3000 पेड़ों की प्रस्तावित कटाई के विरोध में बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए हैं। हाथों में तख्तियां, चेहरे पर आक्रोश और आवाज में भविष्य की चिंता लिए इन युवाओं ने साफ संदेश दिया कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं। छात्र, शोधार्थी, पर्यावरण कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और आम नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि हजारों पेड़ों की बलि देकर विकास होगा तो आने वाली पीढ़ियों को केवल चौड़ी सड़कें मिलेंगी, लेकिन सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा और पीने के लिए पर्याप्त पानी नहीं बचेगा।
युवाओं का कहना है कि यह आंदोलन केवल 3000 पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य को बचाने का है। उनका तर्क है कि हिमालयी राज्य में एक-एक पेड़ का महत्व मैदानी इलाकों से कहीं अधिक है। यहां पेड़ केवल आक्सीजन नहीं देते, बल्कि जलस्रोतों को जीवित रखते हैं, भूस्खलन रोकते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं। युवाओं ने सवाल उठाया कि क्या किसी परियोजना का ऐसा विकल्प नहीं खोजा जा सकता जिसमें कम से कम पेड़ों की कटाई हो? क्या विकास का मतलब हर बार जंगलों को खत्म करना ही होगा?
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसकी शुरुआत सोशल मीडिया पर हुई और देखते-देखते यह जन आंदोलन में बदलने लगी। इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर हजारों युवाओं ने पेड़ों को बचाने की अपील की। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। यह तस्वीर उत्तराखंड की बदलती युवा सोच को भी दर्शाती है। आज का युवा केवल नौकरी और करियर की बात नहीं कर रहा, बल्कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों को भी अपनी प्राथमिकता बना रहा है। सरकार और संबंधित एजेंसियों का कहना है कि प्रस्तावित परियोजना राज्य के विकास और यातायात व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। उनका दावा है कि पर्यावरणीय नियमों का पालन किया जाएगा तथा कटने वाले पेड़ों के बदले प्रतिपूरक पौधारोपण भी किया जाएगा।
हालांकि पर्यावरणविदों का कहना है कि 50-100 वर्ष पुराने पेड़ों की भरपाई केवल पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। एक विकसित जंगल बनने में दशकों लगते हैं। जोशीमठ धंसाव, लगातार बढ़ते भूस्खलन, अनियमित बारिश, बादल फटना और सूखते धारे-नौले पहले ही हिमालय की संवेदनशीलता की चेतावनी दे चुके हैं। विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि अनियोजित विकास और अंधाधुंध वृक्ष कटान भविष्य में और बड़े संकट पैदा कर सकते हैं। इसी वजह से युवा पूछ रहे हैं कि यदि हर विकास परियोजना की पहली शर्त पेड़ों की कटाई होगी, तो उत्तराखंड की हरियाली आखिर बचेगी कैसे?
विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और सरकार से परियोजना की समीक्षा की मांग की है। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर काम किया जा रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की बन गई है, जिन्होंने राजनीतिक दलों से इतर पर्यावरण को केंद्र में रखकर अपनी बात रखी है। सवाल जो सरकार के सामने हैं क्या परियोजना का वैकल्पिक डिजाइन संभव है? क्या 3000 पेड़ों की कटाई अंतिम विकल्प है? क्या स्वतंत्र पर्यावरणीय मूल्यांकन सार्वजनिक किया जाएगा? क्या स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की राय ली गई? क्या प्रतिपूरक पौधारोपण की निगरानी होगी? इन सवालों के जवाब केवल आंदोलनकारियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
एक समय कहा जाता था कि नई पीढ़ी को पर्यावरण से ज्यादा इंटरनेट की चिंता है। लेकिन देहरादून की सड़कों पर उतरी भीड़ ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। यह जेन-जी अब केवल रील नहीं बना रही, बल्कि पेड़ों के लिए आवाज भी उठा रही है। 3000 पेड़ों की कटाई का विरोध केवल एक परियोजना के खिलाफ आंदोलन नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ आवाज है, जिसमें विकास को केवल कंक्रीट और डामर से मापा जाता है। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जो सड़क भी बनाए और जंगल भी बचाए। क्योंकि उत्तराखंड की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि उसके देवदार, बांज, बुरांश, नदियों और जंगलों से है। यदि यही पहचान खत्म हो गई तो विकास के आंकड़े भले बढ़ जाएं, लेकिन पहाड़ अपनी आत्मा खो देगा।
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