शनिवार, 11 जुलाई 2026
उत्तराखंड कांग्रेस के ‘सारथी’ बैकफुट पर
2027 की लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल बन रही है गैरहाजिरी
उत्तराखंड में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता बढ़ी
पूर्व सीएम हरदा की सीमित मौजूदगी पर हो गई चर्चा तेज
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं, संगठन को सक्रिय करने की कवायद चल रही है और सत्ता परिवर्तन का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल राजनीतिक गलियारों में लगातार तैर रहा हैकृकांग्रेस के सबसे अनुभवी चेहरों में गिने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरदा यानी हरीश रावत अपेक्षाकृत कम सक्रिय क्यों दिखाई दे रहे हैं? उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत लंबे समय तक सबसे प्रभावशाली जननेता रहे हैं। चुनावी रणनीति से लेकर कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देने तक उनकी भूमिका अहम मानी जाती रही है। ऐसे में चुनावी माहौल के बीच उनकी सीमित सार्वजनिक सक्रियता को लेकर तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। बड़े नेताओं के दौरे, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों का सिलसिला जारी है। इसके बावजूद कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि यदि हरीश रावत भी पहले की तरह लगातार जनसभाओं, पदयात्राओं और संगठनात्मक अभियानों में सक्रिय दिखाई दें, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल और मजबूत हो सकता है। हालांकि कांग्रेस के भीतर यह भी राय है कि पार्टी अब सामूहिक नेतृत्व के माडल पर आगे बढ़ रही है और चुनाव किसी एक चेहरे के बजाय पूरी टीम के दम पर लड़ना चाहती है।
हरीश रावत की सीमित सक्रियता को भाजपा भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के नेता आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस अपने सबसे बड़े जनाधार वाले नेता की भूमिका को लेकर स्पष्ट नहीं है। सत्ता पक्ष इसे कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर असमंजस का संकेत बताता है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि पार्टी में सभी वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय है और चुनावी समय आने पर हर नेता अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समय के साथ हरीश रावत की भूमिका में बदलाव आया है। पहले वह आंदोलन, जनसंपर्क और चुनावी अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा होते थे, जबकि अब संगठन में नई पीढ़ी के नेताओं को भी आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके बावजूद यह भी सच है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर कुमाऊं और गढ़वाल के अनेक इलाकों में आज भी हरीश रावत की व्यक्तिगत पहचान और जनसंपर्क क्षमता को कांग्रेस की बड़ी राजनीतिक पूंजी माना जाता है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की मजबूत संगठनात्मक मशीनरी का मुकाबला करना है। ऐसे में अनुभवी नेतृत्व और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि हरीश रावत चुनावी अभियान में अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो इसका असर कार्यकर्ताओं के उत्साह और चुनावी संदेश दोनों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि पार्टी पूरी तरह नए नेतृत्व और सामूहिक रणनीति पर भरोसा करती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वरिष्ठ नेताओं का अनुभव और जनाधार चुनावी अभियान से अलग-थलग न पड़ जाए।
उत्तराखंड की राजनीति में एक कहावत अक्सर सुनाई देती हैकृकांग्रेस का चुनाव और हरदा की चर्चा, दोनों अलग नहीं हो सकते। यही कारण है कि जैसे-जैसे 2027 का चुनाव करीब आएगा, हरीश रावत की भूमिका, उनकी सक्रियता और चुनावी रणनीति में उनकी भागीदारी पर राजनीतिक चर्चाएं और तेज होना लगभग तय है। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस यदि सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, तो उसे अपने अनुभवी नेतृत्व, संगठनात्मक मजबूती और नई राजनीतिक रणनीतिकृतीनों के बीच संतुलन बनाना होगा। उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर यह संतुलन ही जीत और हार के बीच का सबसे महत्वपूर्ण अंतर साबित हो सकता है।
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