मंगलवार, 28 जुलाई 2026

‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’

अब मोबाइल आया और वह रैबार खो गया कभी एक संदेश जोड़ देता था पूरे गांव को व्हाट्सऐप मैसेज से रिश्तों की गर्माहट गुम देहरादून। गढ़वाली गीत ‘न चिट्ठी आयी तेरी, न रैबार...’ यह एक लोकगीत की पंक्ति भर नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की सदियों पुरानी पीड़ा, प्रतीक्षा और अपनत्व का जीवंत दस्तावेज है। इस एक पंक्ति में उस मां की बेचौनी छिपी है, जो परदेस गए बेटे की राह तकती थी, उस पत्नी की आंखों का इंतजार है, जिसका पति फौज की सीमा पर तैनात था और उस पूरे गांव की धड़कन है, जो किसी राहगीर के मुंह से अपने लोगों का हाल सुनने के लिए उत्सुक रहता था। पहाड़ में रैबार केवल संदेश नहीं होता था, वह रिश्तों की सांस था। किसी के हाथ में आई चिट्ठी सिर्फ एक परिवार की नहीं होती थी, उसे पढ़ने और सुनने में पूरा गांव शामिल होता था। जब कोई देहरादून, दिल्ली, मुंबई या लखनऊ से लौटता था, तो लोग सबसे पहले पूछते थेकृहमारे लिए क्या संदेश लाए हो? उस समय न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही हर गांव तक डाक की नियमित सुविधा। लेकिन रिश्ते इतने मजबूत थे कि कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। कोई किसी की बेटी का संदेश लाता, कोई फौज में तैनात जवान का हाल सुनाता, तो कोई शहर में नौकरी कर रहे बेटे की कुशलक्षेम बताता। वह रैबार केवल शब्द नहीं होता था, उसमें घर की खुशबू, गांव की मिट्टी और अपनों की धड़कन समाई होती थी। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हर हाथ में स्मार्टफोन है। एक बटन दबाते ही वीडियो काल हो जाती है। दुनिया सिमटकर हथेली में आ गई है, लेकिन विडंबना यह है कि रिश्तों के बीच की दूरी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। पहले एक चिट्ठी आने पर पूरा गांव खुश हो जाता था, आज दिनभर सैकड़ों संदेश आते हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं मिलता जो किसी रैबार में हुआ करता था। पहाड़ की संस्कृति में रैबार केवल संचार का माध्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी था। गांव का हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख का सहभागी होता था। यदि किसी घर में शहर से चिट्ठी आती, तो पढ़ा-लिखा युवक उसे सबके सामने पढ़कर सुनाता। अगर किसी परिवार में खुशी की खबर होती, तो वह पूरे गांव की खुशी बन जाती और यदि कोई दुखद समाचार आता, तो पूरा गांव उस परिवार के साथ खड़ा दिखाई देता। यही पहाड़ की असली ताकत थीकृसाझेदारी, संवेदना और सामूहिक जीवन। लेकिन विकास और पलायन ने इस व्यवस्था को गहराई से बदल दिया। रोजगार की तलाश में लाखों युवा पहाड़ छोड़कर महानगरों की ओर चले गए। जिन गांवों में कभी रैबार पहुंचाने वाले कदमों की आहट सुनाई देती थी, वहां आज ताले लटके हैं। सूने आंगन, बंद घर और वीरान खेत मानो पूछ रहे होंकृअब किसके लिए आएगा रैबार? सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि नई पीढ़ी रैबार शब्द का अर्थ तो जानती है, लेकिन उसकी आत्मा से परिचित नहीं है। उनके लिए संदेश का मतलब मोबाइल नोटिफिकेशन है, जबकि पुरानी पीढ़ी जानती है कि कभी एक रैबार के लिए महीनों तक इंतजार किया जाता था। उस इंतजार में बेचौनी थी, लेकिन विश्वास भी था कि कोई न कोई अपने गांव लौटेगा और अपनों का हाल जरूर सुनाएगा। आज भी उत्तराखंड के लोकगीतों में रैबार जीवित है। लोकगायक जब मंच पर रैबार का जिक्र करते हैं, तो बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं। क्योंकि उन्हें याद आ जाता है वह दौर, जब रिश्ते नेटवर्क से नहीं, भरोसे से चलते थे, जब संदेश मोबाइल टावर नहीं, इंसान लेकर चलता था और जब पहाड़ की असली पहचान उसकी सामुदायिक संस्कृति थी। तकनीक का विरोध नहीं किया जा सकता और न ही करना चाहिए। समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत खो दें, तो विकास अधूरा रह जाता है। उत्तराखंड को केवल सड़कें, सुरंगें और इंटरनेट ही नहीं चाहिए, बल्कि वह सामाजिक ताना-बाना भी चाहिए जिसने सदियों तक कठिन पहाड़ी जीवन को आसान बनाया। आज जरूरत इस बात की है कि रैबार को केवल लोकगीतों तक सीमित न रहने दिया जाए। स्कूलों में स्थानीय संस्कृति पढ़ाई जाए, गांवों के सांस्कृतिक मेलों में रैबार की परंपरा को जीवित रखा जाए और नई पीढ़ी को बताया जाए कि पहाड़ की असली पहचान उसकी बोली, उसके लोकगीत और उसके रिश्तों की गर्माहट है। शायद अब कोई राहगीर हाथ में चिट्ठी लेकर गांव न पहुंचे, शायद डाकिए की घंटी पहले जैसी उत्सुकता न जगाए, लेकिन यदि हम एक-दूसरे का हाल पूछना नहीं छोड़ेंगे, गांव से अपना रिश्ता नहीं तोड़ेंगे और अपने बुजुर्गों की आवाज सुनते रहेंगे, तो रैबार कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि रैबार कागज पर लिखे कुछ शब्द नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा है। जिस दिन यह आत्मा खो गई, उस दिन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान का एक अमूल्य अध्याय भी इतिहास बन जाएगा।

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