शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

‘च्याऊं’ है प्रकृति का ‘जादुई’ तोहफा

सिर्फ मशरूम नहीं, यह है पहाड़ की परंपरा, सेहत और आजीविका का तगड़ा काम्बिनेशन न बाजार में मिलेगा, न माल में, बारिश की पहली बूंदें और प्रकृति देती है अनमोल तोहफाकृ पहाड़ में जुलाई से सितंबर तक जंगलों में मिलता है स्वाद का यह अनमोल खजाना देहरादून। बारिश की पहली बूंदें जैसे ही उत्तराखंड के पहाड़ों की मिट्टी को भिगोती हैं, जंगलों में एक अनमोल खजाना जन्म लेने लगता है। यह खजाना न सोना है, न चांदी, बल्कि प्रकृति की गोद में उगने वाला पहाड़ी च्याऊं है, जिसे मैदानी भाषा में जंगली मशरूम कहा जाता है। पहाड़ के लोगों के लिए च्याऊं केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि परंपरा, स्वाद, संस्कृति और आजीविका का हिस्सा है। उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं के जंगलों में जून से सितंबर के बीच कई प्रकार के जंगली च्याऊं उगते हैं। स्थानीय लोग इन्हें अलग-अलग नामों से जानते हैं। कहीं इसे च्याऊं कहा जाता है तो कहीं छत्रक या खुंभ। बारिश के बाद गांवों की महिलाएं और बच्चे सुबह-सुबह जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। उनके हाथों में टोकरियां होती हैं और नजरें जंगल की जमीन पर। सूखी पत्तियों और पेड़ों की जड़ों के आसपास उगे च्याऊं को ढूंढना किसी खजाने की तलाश से कम नहीं होता। पहाड़ी च्याऊं अपने अनोखे स्वाद और सुगंध के लिए प्रसि( है। इसे सरसों के तेल, जख्या और स्थानीय मसालों के साथ पकाया जाता है। इसकी सब्जी पहाड़ के पारंपरिक भोजन का विशेष हिस्सा मानी जाती है। ग्रामीण कहते हैं कि एक बार जिसने पहाड़ी च्याऊं का स्वाद चख लिया, वह इसे कभी नहीं भूलता। कई परिवार तो बरसात के पूरे मौसम का इंतजार केवल च्याऊं खाने के लिए करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जंगली मशरूम प्रोटीन, फाइबर, विटामिन बी, आयरन और एंटीआक्सीडेंट का अच्छा स्रोत हैं। इनमें वसा कम होती है और पोषण भरपूर होता है। यही कारण है कि पहाड़ के लोग इसे प्रकृति का पौष्टिक उपहार मानते हैं। पहाड़ी च्याऊं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पहचानना हर किसी के बस की बात नहीं है। गांवों के बुजुर्गों और महिलाओं के पास पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी पारंपरिक जानकारी होती है, जिससे वे खाद्य और विषैले च्याऊं में अंतर कर लेते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हर जंगली मशरूम खाने योग्य नहीं होता। गलत पहचान जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसलिए केवल अनुभवी लोगों की सलाह पर ही च्याऊं का संग्रह किया जाता है। अब पहाड़ी च्याऊं केवल घरेलू भोजन तक सीमित नहीं रह गया है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे स्थानीय बाजारों में बेचकर अच्छी आमदनी भी अर्जित कर रहे हैं। बरसात के मौसम में इसकी कीमत कई बार सैकड़ों रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। पर्यटन के बढ़ते प्रभाव के कारण भी इसकी मांग बढ़ी है। शहरों से आने वाले पर्यटक पहाड़ी च्याऊं के स्वाद का अनुभव करने के लिए विशेष रूप से स्थानीय व्यंजनों की तलाश करते हैं। बदलते मौसम, जंगलों में घटती नमी और अनियंत्रित दोहन का असर अब च्याऊं पर भी दिखाई देने लगा है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले जितनी मात्रा में च्याऊं मिलता था, अब उतना नहीं मिलता। जलवायु परिवर्तन ने इसकी प्राकृतिक वृ(ि को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस जैविक संपदा का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां पहाड़ी च्याऊं को केवल कहानियों में ही जान पाएंगी। पहाड़ में च्याऊं केवल भोजन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का हिस्सा है। बरसात में जब किसी के घर च्याऊं बनता है तो उसकी खुशबू पड़ोस तक पहुंच जाती है और अक्सर यह स्वाद रिश्तों की मिठास भी बढ़ा देता है। गांवों में आज भी बुजुर्ग मुस्कुराते हुए कहते हैंकृबरसात आई है, जंगल में च्याऊं जरूर निकला होगा। पहाड़ी च्याऊं उत्तराखंड की जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संपदा का अनमोल हिस्सा है। यह जंगल का ऐसा उपहार है, जो स्वाद, पोषण और आजीविकाकृतीनों को एक साथ समेटे हुए है। जरूरत इस बात की है कि इसके संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी बारिश के मौसम में जंगल की इस अनमोल सौगात का आनंद उठा सकें।

कोई टिप्पणी नहीं: