शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
पहाड़ की ‘पीड़ा’ चुनावी ‘हथियार’
यूकेडी के उभार की आहट से बदले चुनावी समीकरण
भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे विकल्प की तलाश
पहाड़ के मुद्दों पर फिर मुखर हुई उत्तराखंड क्रांति दल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा जोर पकड़ रही हैकृक्या राज्य में एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति लौट रही है? उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत अपने नाम से जोड़ने वाला उत्तराखंड क्रांति दल लगातार जनसंपर्क अभियान, पहाड़ के मूल मुद्दों और स्थानीय अस्मिता को केंद्र में रखकर खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश में जुटा है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि राज्य में यूकेडी के पक्ष में व्यापक चुनावी लहर बन चुकी है, लेकिन कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच निरंतर सक्रिय रहने में सफल रहती है, तो वह कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।
यूकेडी अपने पुराने राजनीतिक एजेंडेकृस्थायी राजधानी, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी, जल-जंगल-जमीन और पर्वतीय विकासकृको फिर से मजबूती से उठा रही है। पार्टी का तर्क है कि राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी जिन मुद्दों के लिए उत्तराखंड आंदोलन हुआ था, वे आज भी अधूरे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खाली होते गांव, सीमांत क्षेत्रों से पलायन, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों को लेकर यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध रही है। पार्टी का कहना है कि राष्ट्रीय दल चुनाव के समय पहाड़ की बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल बनने की स्थिति में सबसे अधिक फायदा अक्सर तीसरे विकल्प को मिलता है। यदि भाजपा और कांग्रेस दोनों के टिकट वितरण से असंतोष बढ़ता है, तो यूकेडी ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। विशेषकर पर्वतीय सीटों पर स्थानीय चेहरों और क्षेत्रीय मुद्दों की पकड़ रखने वाले प्रत्याशी चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना सकते हैं। यदि यूकेडी सीमित सीटों पर भी प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर प्रभावित हो सकता है।
पार्टी युवाओं, बेरोजगारों और उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े परिवारों तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है। सोशल मीडिया के माध्यम से भी यूकेडी अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है। पार्टी का संदेश है कि उत्तराखंड की समस्याओं का समाधान स्थानीय सोच और स्थानीय नेतृत्व से ही संभव है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल भावनात्मक मुद्दे चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। संगठन, संसाधन, मजबूत उम्मीदवार और बूथ स्तर की तैयारी किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
भले ही यूकेडी पूरे राज्य में सत्ता की मुख्य दावेदार न दिखाई दे, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रभाव निर्णायक हो सकता है। यदि पार्टी 5 से 10 प्रतिशत तक वोट भी अपने पक्ष में खींचने में सफल रहती है, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के पारंपरिक गणित पर असर पड़ सकता है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि चुनाव परिणाम त्रिशंकु स्थिति की ओर बढ़ते हैं, तो क्षेत्रीय दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन के समय क्षेत्रीय नेतृत्व पर भरोसा जताया था, लेकिन बाद के वर्षों में यूकेडी संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और आंतरिक मतभेदों के कारण अपना जनाधार खोती चली गई। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जनता का विश्वास जीतना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी है कि वह आंदोलन की विरासत से आगे बढ़कर आज के उत्तराखंड के लिए एक व्यवहारिक राजनीतिक विकल्प बन सकती है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के लिए फिर से जगह बन रही है या नहीं। आने वाले महीनों में यूकेडी की संगठनात्मक सक्रियता, जनसंपर्क अभियान और स्थानीय मुद्दों पर उसकी पकड़ ही तय करेगी कि मौजूदा चर्चा चुनावी परिणामों में बदलती है या नहीं।
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