शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

रोटना है ‘खुशी’ बांटने की पहाड़ी ‘परंपरा’

पहाड़ की रसोई का अनोखा भूला-बिसरा स्वाद रोटना आज भी रिश्तों में घोलता रहता है मिठास न घी से टपकती मिठाई और न बाजार की चमक हर पर्व और शुभ अवसर की पहली पसंद रोटना देहरादून। आधुनिक जीवनशैली और बाजार की चकाचौंध में उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन धीरे-धीरे लोगों की थाली से गायब होते जा रहे हैं। इन्हीं में एक है रोटनाकृपहाड़ की रसोई में बनने वाला ऐसा पारंपरिक पकवान, जिसकी मिठास केवल स्वाद में नहीं, बल्कि संस्कृति, अपनत्व और लोकजीवन में भी घुली हुई है। एक समय था जब गांव में किसी के घर शुभ कार्य होता, नई फसल कटती, पूजा-अर्चना होती या मेहमान आते, तो रसोई में सबसे पहले रोटना बनाया जाता था। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि खुशी बांटने की परंपरा थी। रोटना गेहूं के आटे से बनाया जाने वाला पारंपरिक मीठा व्यंजन है। इसमें गुड़ या शक्कर, देसी घी और स्थानीय स्वाद के अनुसार सौंफ, इलायची या अन्य घरेलू सामग्री मिलाई जाती है। इसे मोटे आकार में तवे या धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे इसकी सुगंध पूरे घर में फैल जाती है। पहाड़ की महिलाएं बताती हैं कि रोटना केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि परिवार के साथ बैठकर खाने और बांटने की संस्कृति का हिस्सा था। पहाड़ के गांवों में रोटना जन्मोत्सव, नामकरण, विवाह, इगास, हरेला और अन्य शुभ अवसरों पर बनाया जाता रहा है। खेतों में मेहनत के बाद गर्म रोटना और ताजा घी का स्वाद आज भी बुजुर्गों की यादों में बसा हुआ है। पहले जब बाजार से मिठाइयां आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, तब रोटना ही मेहमाननवाजी का सबसे सम्मानजनक व्यंजन माना जाता था। आज गांवों से पलायन, संयुक्त परिवारों का टूटना और फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजनों को पीछे धकेल दिया है। नई पीढ़ी के कई युवाओं ने इसका नाम तो सुना है, लेकिन स्वाद कभी चखा ही नहीं। बुजुर्गों का कहना है कि पहले बच्चों को रोटना बनाना भी सिखाया जाता था, लेकिन अब यह कला धीरे-धीरे घरों से गायब होती जा रही है। यदि रोटना पारंपरिक तरीके से स्थानीय अनाज, गुड़ और सीमित घी के साथ बनाया जाए, तो यह पैकेज्ड मिठाइयों की तुलना में अधिक पौष्टिक विकल्प हो सकता है। स्थानीय अनाज और गुड़ ऊर्जा के साथ पारंपरिक स्वाद भी देते हैं। पहाड़ में ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे संस्कृति तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे में रोटना जैसे पारंपरिक व्यंजन पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं, जिस तरह अन्य राज्यों ने अपने पारंपरिक खाद्य पदार्थों को पर्यटन की पहचान बनाया है, उसी तरह रोटना भी उत्तराखंड की पाक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बन सकता है। पहाड़ की पहचान केवल हिमालय, मंदिरों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं बनती, उसकी असली पहचान गांवों की रसोई में बसती है। रोटना उसी विरासत का स्वाद है, जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में पीछे छोड़ दिया। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल मोबाइल और माल की संस्कृति देंगे, तो वे शायद यह कभी नहीं जान पाएंगे कि पहाड़ की असली मिठास किसी महंगी मिठाई में नहीं, बल्कि मां के हाथों से बने एक साधारण रोटना में बसती थी। पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को बचाना है तो केवल लोकगीत और लोकनृत्य ही नहीं, रसोई की इस अमूल्य परंपरा को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। क्योंकि स्वाद भी इतिहास होता है, और रोटना उस इतिहास का मीठा अध्याय है।

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