गुरुवार, 23 जुलाई 2026

छात्रों के ‘दर्द’ पर सियासत का ‘पहरा’

दिल्ली में लाठियां, देहरादून में हंगामी जंग पर सवाल वही, लड़ाई युवाओं की या चुनाव की जंतर-मंतर से संसद मार्ग और देहरादून की सड़कों तक छिड़ा राजनीतिक घमासान सवालों के घेरे में घिरी लाठीतंत्र की तस्वीरें और 2027-2029 की चुनावी गोटियां देहरादून। दिल्ली में लाठियां चलीं। जंतर-मंतर से संसद मार्ग तक तनाव की तस्वीरें आईं। उसके बाद राजनीति ने वही किया, जो वह अक्सर करती हैकृघटना को मुद्दे में बदला और मुद्दे को चुनाव में। दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए कांग्रेस ने केंद्र सरकार को लोकतंत्र का दमनकारी चेहरा बताया। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास की ओर किए गए विरोध मार्च को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए पलटवार शुरू कर दिया। इसका असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया। भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस मुख्यालय की ओर कूच करने निकले। उधर कांग्रेस कार्यकर्ता भी अपने दफ्तर के बाहर डट गए। पुलिस ने दोनों पक्षों के बीच बैरिकेडिंग कर दी। नारे गूंजे, आरोप लगे, जवाबी आरोप लगे, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह था कि आखिर यह लड़ाई किसके लिए थीकृछात्रों के लिए, लोकतंत्र के लिए या 2027 और 2029 की राजनीति के लिए? राजनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह हर घटना का अपना अर्थ गढ़ लेती है। छात्र आंदोलन हो तो सत्ता उसे कानून-व्यवस्था का मामला बताती है। विपक्ष उसे लोकतंत्र बचाने की लड़ाई कहता है। जनता दोनों पक्षों को सुनती है और फिर अपने जीवन की ओर लौट जाती है, क्योंकि उसकी रोजमर्रा की समस्याएं न नारों से हल होती हैं और न प्रेस कान्फ्रेंस से। देहरादून में भाजपा का कांग्रेस मुख्यालय की ओर कूच केवल विरोध कार्यक्रम नहीं था। यह अपने कार्यकर्ताओं को संदेश देने का भी कार्यक्रम था कि पार्टी राहुल गांधी की राजनीति का जवाब सड़क पर भी देगी। कांग्रेस ने भी पीछे हटने का संकेत नहीं दिया। कार्यकर्ताओं को मुख्यालय पर जुटाया गया। पुलिस को पहले से अंदेशा था कि दोनों पक्ष आमने-सामने आए तो स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए बैरिकेडिंग पहले लगी, समझाइश बाद में हुई। उत्तराखंड की राजनीति में यह दृश्य नया नहीं है, लेकिन इसका समय बेहद महत्वपूर्ण है। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, फिर भी राजनीतिक दल सड़क पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे हैं। भाजपा जानती है कि यदि छात्र आंदोलनों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष को खुला मैदान मिल गया तो उसका राजनीतिक असर चुनाव तक जा सकता है। कांग्रेस समझती है कि दिल्ली की हर घटना को उत्तराखंड के युवाओं से जोड़कर सरकार को घेरा जा सकता है। यानी लड़ाई केवल दिल्ली की नहीं है। लड़ाई उस राजनीतिक नैरेटिव की है, जो आने वाले चुनावों में जनता के मन में बैठेगा। दिलचस्प यह भी है कि दोनों दल लोकतंत्र की रक्षा का दावा कर रहे हैं। कांग्रेस कहती है कि छात्रों पर लाठी चलाना लोकतंत्र की हत्या है। भाजपा कहती है कि प्रधानमंत्री आवास का घेराव लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन आम नागरिक पूछ रहा हैकृक्या लोकतंत्र केवल तब खतरे में पड़ता है जब विरोधी दल सड़क पर उतरता है? युवाओं की नजर से देखें तो तस्वीर और अलग दिखाई देती है। उन्हें रोजगार चाहिए, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता चाहिए, शिक्षा व्यवस्था में भरोसा चाहिए। लेकिन राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में अक्सर मुद्दों से अधिक मुद्दों की राजनीति दिखाई देती है। यही कारण है कि कई बार सड़क पर छात्रों की आवाज पीछे छूट जाती है और राजनीतिक दलों के झंडे आगे निकल जाते हैं। देहरादून में पुलिस ने दोनों दलों को आमने-सामने आने से रोक दिया। कानून-व्यवस्था के लिहाज से यह जरूरी भी था। लेकिन यह दृश्य एक बड़ा राजनीतिक संकेत छोड़ गया। उत्तराखंड अब केवल पहाड़, पर्यटन और चारधाम की राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाला। यहां राष्ट्रीय मुद्दों की सीधी टक्कर भी देखने को मिलेगी। दिल्ली का राजनीतिक तापमान अब देहरादून की सड़कों पर भी महसूस होगा। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सोशल मीडिया ने इस टकराव को और तीखा बना दिया है। हर दल अपने समर्थकों तक अपनी तस्वीरें पहुंचा रहा है। हर वीडियो का अपना राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है। किसी के लिए यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है, तो किसी के लिए अराजकता के खिलाफ संघर्ष। लेकिन कैमरे के फ्रेम से बाहर खड़ा नागरिक अभी भी महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवालों का जवाब तलाश रहा है। राजनीतिक दलों के लिए सड़क पर उतरना लोकतांत्रिक अधिकार है। विरोध करना भी अधिकार है। लेकिन विरोध तब सार्थक बनता है जब वह जनता के मुद्दों को केंद्र में रखे, न कि केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को घेरने का माध्यम बन जाए। यदि हर प्रदर्शन का अंत केवल नारे, धक्का-मुक्की और प्रेस बयान में होना है, तो लोकतंत्र की ऊर्जा धीरे-धीरे राजनीतिक प्रदर्शन में बदलने लगेगी। देहरादून की बैरिकेडिंग केवल दो दलों के बीच नहीं लगी थी। वह शायद उस दूरी का प्रतीक भी थी, जो राजनीति और जनता के वास्तविक सरोकारों के बीच लगातार बढ़ती जा रही है। एक तरफ सत्ता अपने बचाव में है, दूसरी तरफ विपक्ष अपने हमले में। बीच में खड़ा नागरिक अब भी इंतजार कर रहा है कि कोई उसकी बात भी सुने। दिल्ली की लाठियों से शुरू हुई बहस देहरादून की सड़कों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में यह टकराव और तेज हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र की असली जीत तब होगी, जब राजनीतिक दल एक-दूसरे के मुख्यालय का घेराव करने से पहले उन सवालों का घेराव करेंगे जो वर्षों से उत्तराखंड और देश के युवाओं के सामने खड़े हैं। क्योंकि आखिर में इतिहास यह नहीं पूछता कि किसने किसका दफ्तर घेरा था। इतिहास यह पूछता है कि सत्ता और विपक्षकृदोनों ने जनता के सवालों का जवाब दिया था या नहीं।

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