गुरुवार, 23 जुलाई 2026

‘अब हल्या, हल और बैल भी गुम’

रोपाई के मंगल गीतों से गूंजने वाले खेत अब हो गए है बंजर गांवों में पीछे छूट कई लोक-समृ(ि और पुरखों की विरासत पलायन और बंजर खेतों ने छीन ली पहाड़ की कृषि संस्कृति इतिहास के पन्नों में खो रही पहाड़ के गांवों की आत्मनिर्भरता देहरादून। कभी पहाड़ के गांवों की सुबह बैलों के गले में बंधे खांखरे की मधुर आवाज से होती थी। खेतों में हल चलता था, महिलाएं रोपाई के गीत गाती थीं और गोठ में बंधी गाय-भैंस गांव की समृ(ि का प्रतीक मानी जाती थीं। गांव का वह परिवार सबसे संपन्न माना जाता था, जिसके पास मजबूत बैलों की जोड़ी होती थी। बैल सिर्फ खेती का साधन नहीं, बल्कि गांव की प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और मेहनतकश जीवन का प्रतीक थे। आज वही पहाड़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कई गांवों में बैलों की आखिरी जोड़ी भी गांव छोड़ने को मजबूर है। पिछले ढाई-तीन दशकों में पहाड़ का ग्रामीण जीवन तेजी से बदला है। शिक्षा, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवाओं का पलायन हुआ। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं रह गईं। खेती श्रम मांगती है, पशुपालन चौबीस घंटे की जिम्मेदारी है। जब खेत जोतने वाले हाथ ही कम पड़ गए तो बैलों की जरूरत भी खत्म होती चली गई। पहले बैल बिके, फिर गाय-भैंसें कम हुईं और अब अधिकांश गांवों के गोठ खाली पड़े हैं। पहाड़ में खेती छोड़ने का सबसे बड़ा प्रमाण अब खेतों में दिखने लगा है। जिन खेतों में कभी धान, मंडुवा, झंगोरा, गेहूं और राजमा की फसलें लहलहाती थीं, वहां आज झाड़ियां, चीड़ के पौधे और जंगली वनस्पति उग आई है। वर्षों से बिना जोते खेत धीरे-धीरे जंगल में बदल रहे हैं। इसके साथ ही जंगली जानवरों का आतंक भी बढ़ा है। बंदर, जंगली सूअर, साही और अन्य वन्यजीव बची-खुची खेती को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में खेती करने की इच्छा रखने वाले किसान भी हतोत्साहित हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पहले परिवार अपनी जरूरत का अधिकांश अनाज खुद पैदा करता था। खेती जीवन का आधार थी। अब सरकारी राशन योजनाओं, बाजार तक आसान पहुंच और रोजगार के नए विकल्पों ने ग्रामीण जीवन की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने गरीब परिवारों को राहत जरूर दी, लेकिन कई क्षेत्रों में खेती पर निर्भरता भी कम होती चली गई। अब मेहनत से खेती करने की बजाय बाजार से अनाज खरीदना आसान विकल्प माना जाने लगा है। पहाड़ के गांवों से बैलों का गायब होना केवल कृषि संकट नहीं है। इसके साथ ही पहाड़ की सदियों पुरानी संस्कृति भी कमजोर हो रही है। हरेला, रोपाई, सामूहिक श्रम, गोठ संस्कृति, जैविक खेती और पारंपरिक बीजों की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। नई पीढ़ी बैलों से जुड़ी उस जीवनशैली को देख ही नहीं पा रही, जो कभी उत्तराखंड की पहचान थी। आने वाले समय में पहाड़ के अधिकांश गांवों में बैलों की जोड़ी केवल तस्वीरों और लोकगीतों में ही दिखाई देगी। आज भी कुछ गांवों में कोई बुजुर्ग अपनी बैलों की जोड़ी के साथ खेत जोतता दिखाई देता है। वह केवल अपनी जमीन नहीं जोत रहा होता, बल्कि एक पूरी परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश कर रहा होता है। लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद क्या होगा? क्या अगली पीढ़ी फिर कभी हल और बैलों के साथ खेत में उतरेगी, या पहाड़ की खेती इतिहास बनकर रह जाएगी? पहाड़ के गांवों में घटती बैलों की संख्या केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें पलायन, बदलती अर्थव्यवस्था, घटती खेती और बंजर होते खेत मिलकर पहाड़ की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रहे हैं। बाक्स पहाड़ की बदलती तस्वीर 25-30 वर्ष पहले अधिकांश गांवों में बैलों की कई जोड़ियां होती थीं। आज अनेक गांवों में एक भी बैल नहीं बचा। खाली पड़े खेतों में झाड़ियां और जंगल तेजी से फैल रहे हैं। जंगली जानवर खेती छोड़ने की बड़ी वजह बन रहे हैं। गोठ खाली हैं, पशुपालन लगातार घट रहा है। खेती के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन भी कमजोर पड़ रहा है। जिस दिन पहाड़ के गांवों से आखिरी बैलों की जोड़ी भी खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक कृषि परंपरा नहीं टूटेगी, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।

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