सोमवार, 27 जुलाई 2026

सदियों से ‘जैविक’ है पहाड़ की खेती

अब दुनिया सीख रही है पहाड़ का माडल रसायनों से दूर रही पहाड़ के गांवों में कृषि मंडुवा-झंगोरा, राजमा और गहत सुपरफूड देहरादून। जब पूरी दुनिया रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से जूझ रही है और आर्गेनिक खाद्य पदार्थों की मांग लगातार बढ़ रही है, तब उत्तराखंड के पहाड़ों की ओर दुनिया की नजरें फिर से उठने लगी हैं। कारण साफ हैकृयहां की खेती किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा से जैविक रही है, जिस खेती को आज आधुनिक दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग कहकर करोड़ों रुपये के कारोबार में बदल रही है, वह पहाड़ के किसानों की जीवनशैली का हिस्सा रही है। पहाड़ के गांवों में वर्षों तक खेतों में न तो रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग हुआ और न ही कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल। गोबर की खाद, पत्तियों से बनी जैविक खाद, पशुपालन और मिश्रित खेती ने यहां की कृषि को स्वाभाविक रूप से जैविक बनाए रखा। यही कारण है कि पहाड़ का मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, चौलाई, राजमा और लाल चावल आज देश ही नहीं, विदेशों में भी सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहे हैं। विडंबना यह है कि जिस किसान ने सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खेती की, वही आज सबसे अधिक आर्थिक संकट से जूझ रहा है। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जैविक खेती की पहचान तो बनी, लेकिन उसका आर्थिक लाभ किसान तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। पहाड़ की कृषि केवल अन्न उत्पादन नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का भी माडल है। यहां की सीढ़ीनुमा खेती मिट्टी के कटाव को रोकती है। जंगल, जलस्रोत और खेती एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। यही कारण है कि उत्तराखंड की पारंपरिक कृषि जलवायु परिवर्तन के दौर में भी टिकाऊ खेती का उदाहरण मानी जाती है। आज दुनिया मिलेट्स श्री अन्न को भविष्य का भोजन बता रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भी मोटे अनाजों के महत्व को स्वीकार किया है। लेकिन उत्तराखंड का किसान सदियों से मंडुवा और झंगोरा खाता और उगाता आया है, जो भोजन कभी गरीबी की पहचान समझा जाता था, वही अब बड़े शहरों के सुपरमार्केट और पांच सितारा होटलों में ऊंचे दामों पर बिक रहा है। उत्तराखंड की जैविक खेती को वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ा जाए तो यह राज्य की अर्थव्यवस्था की नई रीढ़ बन सकती है। स्थानीय उत्पादों को भौगोलिक पहचान, ई-कामर्स और निर्यात बाजार से जोड़कर किसानों की आय में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। छोटे जोत, जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक, सिंचाई की कमी, परिवहन की दिक्कत और विपणन व्यवस्था की कमजोरी किसानों का मनोबल तोड़ रही है। कई गांवों में खेत इसलिए खाली हैं क्योंकि खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है। राज्य सरकार समय-समय पर जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजनाएं चलाती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। असली जरूरत किसान को बाजार, उचित मूल्य और ब्रांड पहचान दिलाने की है। यदि पहाड़ के उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचें तो किसान की आय कई गुना बढ़ सकती है। उत्तराखंड में पर्यटन और कृषि का मेल भी नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। एग्री-टूरिज्म, होमस्टे के साथ स्थानीय भोजन, जैविक उत्पादों की बिक्री और पारंपरिक खेती का अनुभव पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। इससे गांवों में रोजगार भी बढ़ेगा और पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लग सकती है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पहाड़ में जैविक खेती होती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उस किसान को पहचान और सम्मान दे पा रहे हैं, जिसने बिना किसी प्रमाणपत्र के सदियों से धरती, पानी और पर्यावरण की रक्षा करते हुए प्राकृतिक खेती को जीवित रखा है। उत्तराखंड की पहचान केवल देवभूमि या पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसकी असली ताकत इसकी पारंपरिक जैविक कृषि है। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और बाजार मिलकर इस विरासत को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ दें, तो उत्तराखंड न केवल देश का अग्रणी जैविक राज्य बन सकता है, बल्कि पलायन जैसी गंभीर समस्या का स्थायी समाधान भी खोज सकता है। पहाड़ की खेती को दया नहीं, सही दाम, मजबूत बाजार और वैश्विक पहचान की जरूरत है। यही उत्तराखंड के ग्रामीण भविष्य की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकती है।

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