शनिवार, 11 जुलाई 2026

धामी के ‘हैट्रिक’ के दावे के सामने कांग्रेस ‘ढर्रा’

उत्तराखंड कांग्रेस के सामने संगठन से लेकर नेतृत्व तक की अग्निपरीक्षा नेताओं की ऊर्जा आपसी कलह में नहीं, जनता के बीच दिखनी चाहिए अब संगठन में सक्रियता और जवाबदेही से ही तय होगा नेताओं का कद जमीनी पकड़ और बूथ पर परिणाम देने वालों को ही मिल सकती है तवज्जो देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इस समय दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संगठन को फिर से खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है। दिल्ली से मिले संदेश ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब बयानबाजी नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर परिणाम देने होंगे। कांग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने संगठन की सक्रियता और जवाबदेही पर जिस तरह जोर दिया, उसका सीधा असर उत्तराखंड कांग्रेस पर पड़ना तय माना जा रहा है। प्रदेश में लंबे समय से नेतृत्व, गुटीय समीकरण और टिकट की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं चलती रही हैं। अब केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि नेताओं की ऊर्जा आंतरिक खींचतान में नहीं, बल्कि जनता के बीच दिखाई दे। प्रदेश कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक मंच पर लाकर चुनावी अभियान को गति दे। यदि गुटीय राजनीति जारी रही तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। इसके मुकाबले कांग्रेस महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और स्थानीय युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इन मुद्दों को गांव-गांव और बूथ-बूथ तक पहुंचाने वाला मजबूत संगठन भी चाहिए। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सरकारों के खिलाफ असंतोष समय-समय पर उभरता रहा है। लेकिन हर बार विपक्ष उसे चुनावी लाभ में बदल पाए, ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। यदि पार्टी स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती है, संगठन को सक्रिय करती है और टिकट वितरण में समय रहते स्पष्टता लाती है, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। लेकिन यदि अंदरूनी खींचतान हावी रही तो सत्ता विरोधी भावना भी बिखर सकती है। वेणुगोपाल के संकेतों का एक असर टिकट वितरण पर भी पड़ सकता है। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी सक्रियता, जनस्वीकार्यता और संगठनात्मक प्रदर्शन को भी महत्व देगा। इससे कई दावेदारों के लिए चुनौती बढ़ सकती है। 2027 के चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या और महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी चुनावी समीकरण बदल सकती है। कांग्रेस यदि इन दोनों वर्गों के लिए स्पष्ट एजेंडा और विश्वसनीय नेतृत्व प्रस्तुत करती है तो उसे राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर भाजपा भी अपने संगठन और सरकारी योजनाओं के दम पर इन्हीं वर्गों को साधने में जुटी हुई है। वेणुगोपाल का ष्एक्शन प्लानष् उत्तराखंड कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश से अधिक एक संगठनात्मक चेतावनी भी है। अब यह देखना होगा कि प्रदेश नेतृत्व इसे कितनी गंभीरता से लागू करता है। आने वाले महीनों में कांग्रेस की सक्रियता, जनआंदोलन, सदस्यता अभियान और बूथ प्रबंधन ही तय करेंगे कि पार्टी 2027 में सत्ता की मजबूत दावेदार बनती है या फिर विपक्ष की भूमिका तक सीमित रह जाती है। उत्तराखंड में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी, बल्कि संगठन बनाम असंतोष की भी होगी। भाजपा अपनी संगठित चुनावी मशीनरी और सरकार के कामकाज के आधार पर मैदान में उतरेगी, जबकि कांग्रेस को सत्ता विरोधी माहौल को जनसमर्थन में बदलने के लिए जमीन पर असाधारण मेहनत करनी होगी।

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