शनिवार, 11 जुलाई 2026
खो गई सिलबट्टे की ‘खर्र-खर्र’ और रसोई की ‘रौनक’
आधुनिक गैजेट्स ने बदल दी है पहाड़ के रसोई की अनोखी रंगत
मिक्सर व ग्राइंडर के शोर में कहीं खो गई सिलबट्टे की खर्र-खर्र
आज भी अधूरी है सिलबट्टे वाले नमक-चटनी की सोंधी खुशबू
पहाड़ के गांवों की रसोई में यह केवल पत्थर नहीं एक संस्कृति
देहरादून। एक समय था जब पहाड़ के किसी भी गांव में सुबह की शुरुआत केवल पक्षियों की चहचहाहट से नहीं होती थी, बल्कि रसोई से आती सिलबट्टे पर मसाले पीसने की खर्र-खर्र की आवाज से होती थी। वह आवाज़ किसी मशीन की नहीं, बल्कि एक घर के जीवंत होने की पहचान होती थी। सिलबट्टा केवल दो पत्थरों का मेल नहीं था। वह पहाड़ की गृहस्थी का सबसे भरोसेमंद साथी था। उस पर पीसी गई हरी मिर्च, भांग की चटनी, भुना नमक, जाखिया, तिल, धनिया और लहसुन का स्वाद आज भी किसी आधुनिक मिक्सर की तेज धार नहीं दे पाती। आज रसोई में मिक्सर है, ग्राइंडर है, फूड प्रोसेसर है, लेकिन सिलबट्टे पर पीसे मसालों की आत्मा कहीं पीछे छूट गई है।
पहाड़ की माताएं घंटों सिलबट्टे पर मसाले पीसती थीं। उनके हाथों की लय ऐसी होती थी कि मसाले केवल पिसते नहीं थे, उनमें अपनापन भी घुल जाता था। जब भांग की चटनी सिल पर तैयार होती थी, उसकी खुशबू पूरे आंगन में फैल जाती थी। बच्चे रोटी लेकर पहले ही बैठ जाते थे। कहा जाता है कि सिलबट्टे पर पीसने से मसालों का तेल और प्राकृतिक सुगंध बनी रहती है। शायद यही कारण है कि पुराने लोग आज भी कहते हैंकृमिक्सर मसाला पीसता है, सिलबट्टा स्वाद बनाता है। आज गांवों में भी कई सिलबट्टे धूल खा रहे हैं। कुछ घरों में तुलसी के चौरे के पास पड़े हैं, तो कहीं गोठ के किनारे। नई पीढ़ी के लिए वह बस एक भारी पत्थर है, लेकिन बुजुर्गों की आंखों में उसे देखकर बीते समय की पूरी कहानी उतर आती है। उस पत्थर पर वर्षों तक परिवार की रोटी का स्वाद तैयार हुआ। त्योहारों की चटनियां बनीं। मेहमानों के स्वागत की तैयारी हुई। बच्चों के लिए पहली बार दलिया पीसा गया। कितनी पीढ़ियों की स्मृतियां उसकी सतह पर आज भी जैसे अंकित हैं।
सिलबट्टा उस दौर की पहचान भी है जब पहाड़ आत्मनिर्भर था। मसाले बाजार से तैयार नहीं आते थे। खेत में उगते थे घर में सुखाए जाते थे और सिलबट्टे पर पीसे जाते थे। हर चटनी का स्वाद अलग होता था क्योंकि उसमें घर की मिट्टी, पानी और हाथों का स्पर्श शामिल होता था। यह केवल रसोई का औजार नहीं था, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के श्रम, धैर्य और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक था।
बदलती जीवनशैली ने सिलबट्टे को लगभग रसोई से बाहर कर दिया है। शहरों में तो यह सजावट की वस्तु बन चुका है और गांवों में भी इसका उपयोग तेजी से घट रहा है। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी केवल किताबों में पढ़ेगी कि कभी मसाले पत्थर पर भी पीसे जाते थे? क्या वह कभी समझ पाएंगे कि भांग की चटनी का असली स्वाद मशीन से नहीं, मां के हाथों और सिलबट्टे की धीमी रगड़ से पैदा होता था?
पहाड़ की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और लोकगीतों में नहीं बसती। वह रसोई में रखे उन साधारण दिखने वाले उपकरणों में भी जीवित है, जिन्होंने पीढ़ियों का जीवन संवारा। सिलबट्टा उनमें सबसे महत्वपूर्ण है। यदि हम अपनी पारंपरिक रसोई, स्थानीय भोजन और लोक संस्कृति को बचाना चाहते हैं, तो सिलबट्टे जैसी विरासत को भी सम्मान देना होगा। क्योंकि जिस दिन पहाड़ के घरों से सिलबट्टे की आखिरी खनक खत्म हो जाएगी, उस दिन केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक अनमोल अध्याय भी हमेशा के लिए मौन हो जाएगा।
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