शनिवार, 18 जुलाई 2026

जंतर-मंतर पर ‘लोकतंत्र’ की घेराबंदी

अस्पताल पहुंचे सोनम वांगचुक, आंदोलन स्थल खाली कराने से उठे सवाल 21 दिन के अनशन के बाद पुलिस ने सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया प्रदर्शनकारियों को हटाने की कार्रवाई से विपक्ष ने किया सरकार पर हमलाकृ नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी असहमति को सुनने की क्षमता मानी जाती है। लेकिन शनिवार को राजधानी के जंतर-मंतर से जो तस्वीर सामने आई, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या देश में विरोध दर्ज कराने की लोकतांत्रिक जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है? 21 दिनों से अनशन पर बैठे शिक्षाविद सोनम वांगचुक को पुलिस सफदरजंग अस्पताल ले गई और इसके साथ ही जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को हटाने की कार्रवाई शुरू हो गई। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है। पुलिस का कहना है कि वांगचुक की तबीयत गंभीर हो रही थी और डाक्टरों की सलाह पर उन्हें अस्पताल ले जाना आवश्यक था। प्रशासन का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की रक्षा उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह केवल चिकित्सीय हस्तक्षेप नहीं, बल्कि आंदोलन की धार कुंद करने की कोशिश थी। उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों को हटाकर उस आवाज को कमजोर करने का प्रयास किया गया जो पिछले कई दिनों से सत्ता के सामने असहज सवाल खड़े कर रही थी। जंतर-मंतर वर्षों से देश में लोकतांत्रिक विरोध का प्रतीक माना जाता रहा है। किसान आंदोलन हो, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान हो या छात्र और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शनकृयहीं से कई राष्ट्रीय बहसों ने जन्म लिया। ऐसे में किसी आंदोलन का इस तरह अचानक समाप्त होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रश्न खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यदि किसी अनशनकारी की हालत गंभीर हो जाए, तो प्रशासन पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी होती है। सवाल केवल इतना नहीं कि सोनम वांगचुक अस्पताल क्यों पहुंचे। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली घड़ी वही होती है, जब उसे प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है? इतिहास बताता है कि कई बार आंदोलनों को रोकने की कोशिशों ने उन्हें और अधिक राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। विपक्ष ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताते हुए सरकार को घेरा है। दूसरी ओर सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी नागरिक की जान की रक्षा करना प्रशासन का दायित्व है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असहमति और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच संतुलन बनाना लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा है। राजनीतिक ष्टि से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। जब देश में युवाओं, परीक्षाओं, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर बहस तेज है, तब किसी प्रमुख आंदोलन का इस तरह समाप्त होना स्वाभाविक रूप से सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव को और तीखा करेगा। यह भी संभव है कि जंतर-मंतर से हटी आवाज अब संसद, अदालतों, सोशल मीडिया और देशभर के विश्वविद्यालयों तक और व्यापक रूप से पहुंचे। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृसोनम वांगचुक अस्पताल में हैं, जंतर-मंतर खाली कराया जा रहा है, लेकिन जिन सवालों को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, वह अभी भी देश की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बने हुए हैं। लोकतंत्र की असली कसौटी अब यही होगी कि इन सवालों का जवाब संवाद से मिलता है या टकराव से।

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