शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

यूकेडी का इतिहास ‘हिट’ वजूद ‘फ्लाप’

यूकेडी के स्थापना दिवस पर विशेष यह है संघर्ष की विरासत और सियासी हाशिए की अनोखी कहानी 47 साल पहले जिस आंदोलन ने उत्तराखंड राज्य का सपना जगाया वही उत्तराखंड क्रांति दल आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास लिखते समय यदि किसी एक दल को नजरअंदाज कर दिया जाए तो वह इतिहास अधूरा रहेगा। यह दल है उत्तराखंड क्रांति दल। 24-25 जुलाई 1979 को नैनीताल में स्थापित यूकेडी केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि पहाड़ की अस्मिता, पहचान और अलग राज्य की आकांक्षा का राजनीतिक मंच था। आज, स्थापना के लगभग पांच दशक बाद, वही दल अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के संघर्ष में है। विडंबना यह है कि जिस राज्य के निर्माण का श्रेय उसके आंदोलन को जाता है, उसी राज्य की सत्ता की राजनीति में वह हाशिए पर पहुंच चुका है। सत्तर के दशक के अंत में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का गंभीर अभाव था। पहाड़ के लोग लगातार पलायन कर रहे थे और प्रशासनिक उपेक्षा का भाव गहराता जा रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में 24-25 जुलाई 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ। यूकेडी ने पहली बार राजनीतिक रूप से यह स्थापित किया कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान अलग राज्य के बिना संभव नहीं है। उस समय राष्ट्रीय दल इस मांग को गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन यूकेडी ने गांव-गांव जाकर अलग उत्तराखंड राज्य की चेतना जगाई। यही चेतना आगे चलकर 1994 के जनआंदोलन में बदल गई। उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा की घटनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि उन वर्षों की राजनीतिक तैयारी का भी इतिहास है, जिसे यूकेडी ने लगातार आगे बढ़ाया। जब राष्ट्रीय दल अलग राज्य की मांग पर स्पष्ट नहीं थे, तब यूकेडी ने विधानसभा से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को जीवित रखा। आंदोलन के दौरान हजारों कार्यकर्ता जेल गए, लाठियां खाईं और कई ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसलिए उत्तराखंड बनने के बाद यह उम्मीद थी कि राज्य की पहली पसंद यूकेडी होगी। लेकिन राजनीति ने अलग दिशा पकड़ ली। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। यह वह क्षण था जिसके लिए यूकेडी दो दशक से अधिक समय तक संघर्ष करता रहा। लेकिन राज्य बनने के बाद जनता ने सत्ता की कमान राष्ट्रीय दलोंकृभाजपा और कांग्रेसकृके हाथों में सौंप दी। यूकेडी कभी सरकार में सहयोगी बना, कभी विपक्ष में रहा, लेकिन वह कभी राज्य की मुख्य राजनीतिक शक्ति नहीं बन पाया। इसके पीछे कई कारण रहे, इसमें लगातार गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष, संगठन का गांव स्तर पर कमजोर होना, नए नेतृत्व को समय पर आगे न बढ़ा पाना, आंदोलन की राजनीति से शासन की राजनीति में प्रभावी बदलाव न कर पान, भाजपा और कांग्रेस द्वारा क्षेत्रीय मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर लेना। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे यूकेडी का जनाधार सिकुड़ता गया। यूकेडी की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैचारिक पहचान थीकृपहाड़ पहले। जल, जंगल, जमीन, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पलायन रोकना, मूल निवास, भू-कानून, मजबूत पंचायत व्यवस्था और पर्यावरण आधारित विकासकृये सभी मुद्दे यूकेडी दशकों पहले उठा चुका था। विडंबना यह रही कि समय के साथ यही मुद्दे भाजपा और कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा बन गए, जबकि यूकेडी इन्हें राजनीतिक लाभ में बदलने में पीछे रह गया। आज भी राज्य में जब भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, पलायन, चारधाम, वनाधिकार और स्थानीय संसाधनों की बात होती है तो यूकेडी के पुराने दस्तावेज और आंदोलन याद किए जाते हैं। लेकिन चुनाव आते-आते चर्चा भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश में है। आम आदमी पार्टी, बसपा और अन्य दल भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं। ऐसे में यूकेडी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह सरकार बनाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह फिर से जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता स्थापित कर पाएगा? पिछले कुछ वर्षों में पार्टी लगातार अनुशासन, नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक विवादों से जूझती रही है। कई वरिष्ठ नेता अलग हुए, कई नए चेहरे आए, लेकिन व्यापक जनाधार वापस नहीं लौट पाया। हालांकि पार्टी आज भी राज्य के उन मुद्दों पर मुखर दिखाई देती है जिन्हें क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ा जाता है। बाक्स क्षेत्रीय राजनीति की वापसी उत्तराखंड की राजनीति में एक बड़ा प्रश्न लगातार पूछा जा रहा हैकृक्या राज्य फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प की तलाश करेगा? इसके पीछे कुछ कारण भी हैंकृकि लगातार बढ़ता पलायन,पर्वतीय जिलों में घटती आबादी, रोजगार का संकट, स्थानीय संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण को लेकर बहस, भू-कानून और मूल निवास की मांग, पहाड़ और मैदान के विकास में असंतुलन। यदि यह मुद्दे चुनाव का केंद्रीय एजेंडा बनते हैं तो यूकेडी के पास राजनीतिक अवसर मौजूद हो सकता है। लेकिन केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। यूकेडी को मजबूत संगठन, युवा नेतृत्व, स्पष्ट चुनावी रोडमैप और आधुनिक राजनीतिक अभियान की आवश्यकता होगी। सोशल मीडिया से लेकर बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाए बिना वापसी आसान नहीं होगी। इतिहास का सम्मान, भविष्य की चुनौती यूकेडी की सबसे बड़ी पूंजी उसका इतिहास है, लेकिन चुनाव इतिहास नहीं, वर्तमान संगठन और भविष्य की विश्वसनीयता से जीते जाते हैं। आज की युवा पीढ़ी उत्तराखंड आंदोलन को किताबों और स्मृति दिवसों के माध्यम से जानती है। उसके लिए रोजगार, स्टार्टअप, डिजिटल अवसर, बेहतर शिक्षा और आधुनिक बुनियादी ढांचा अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि यूकेडी अपने मूल विचारकृस्थानीय हित सर्वाेपरिकृको नई पीढ़ी की आकांक्षाओं से जोड़ पाता है, तो उसके लिए राजनीतिक संभावनाएं बन सकती हैं। लेकिन यदि वह केवल आंदोलन की विरासत पर निर्भर रहा तो उसका दायरा स्मृति समारोहों तक सीमित होने का खतरा रहेगा। भविष्य गढ़ने की चुनौती 24-25 जुलाई केवल एक राजनीतिक दल का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि उस विचार का स्मरण है जिसने उत्तराखंड राज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब राज्य अपने गठन के ढाई दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब यह सवाल पहले से अधिक प्रासंगिक हैकृक्या उत्तराखंड की राजनीति में फिर किसी मजबूत क्षेत्रीय आवाज की जरूरत है, या राष्ट्रीय दल ही राज्य की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे? इस प्रश्न का उत्तर 2027 का चुनाव देगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीतिक यात्रा में उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास हमेशा सम्मान के साथ दर्ज रहेगा। अब चुनौती इतिहास लिखने की नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने की है।

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