शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

‘गोठ’ वीरान और पहाड़ की ‘धड़कन’ खामोश

जब गोठ आबाद थे, तब पहाड़ भी आबाद और पशुओं का वह ठिकाना भी पहाड़ की अर्थव्यवस्था, संस्कृति व आत्मनिर्भर जीवन का था विश्वविद्यालय आज गोठों के उजड़ने के साथ सूखती जा रही है पहाड़ की जीवन-धारा भी दूध की बाल्टियों से झाड़ियों के जंगल,उजड़ते गोठों में कैद पहाड़ की कसक देहरादून। पहाड़ की पहचान केवल बर्फ से ढकी चोटियों, देवदार के जंगलों और कल-कल बहती नदियों से नहीं थी। उसकी असली पहचान उन गोठों से भी थी, जो गांवों से कुछ दूर ऊंची ढलानों, बुग्यालों और जंगलों के किनारे बने होते थे। मिट्टी, पत्थर और लकड़ी से बने यह छोटे-छोटे आश्रय केवल गाय, बैल, भैंस और बकरियों के रहने की जगह नहीं थे, बल्कि पूरे पहाड़ी जीवन की धड़कन थे। आज जब पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर पड़ रहे हैं और पशुपालन सिमटता जा रहा है, तब सबसे पहले वीरान हुए हैं गोठ। जिन गोठों में कभी घंटियों की मधुर आवाज गूंजती थी, वहां अब झाड़ियां उग आई हैं। जिन चौखटों पर सुबह-सुबह दूध की बाल्टियां रखी जाती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। गोठ का उजड़ना केवल एक भवन का उजड़ना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का मौन हो जाना है। राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं में गोठ सदियों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। गांवों के अधिकांश परिवार खेती और पशुपालन पर निर्भर थे। खेतों की उर्वरता पशुओं के गोबर से आती थी, घर का भोजन दूध, दही, घी और छाछ से समृद्ध होता था और खेती का सबसे बड़ा सहारा बैल हुआ करते थे। इसी व्यवस्था का केंद्र था गोठ। बरसात के मौसम में हरी घास का भंडारण, सर्दियों के लिए चारे की व्यवस्था, पशुओं की देखभाल, बछड़ों का पालन और दूध निकालने से लेकर खाद तैयार करने तक का पूरा चक्र गोठ के इर्द-गिर्द चलता था। पहाड़ की अर्थव्यवस्था बैंक खातों से नहीं, गोठों की समृद्धि से मापी जाती थी। किसी परिवार के पास कितनी गायें हैं, कितने बैल हैं और गोठ कितना बड़ा हैकृयही उसकी आर्थिक स्थिति का पैमाना माना जाता था। शाम ढलते ही गांव के बुजुर्ग गोठ पहुंच जाते थे। युवा पशुओं को चारा डालते और बच्चे वहीं खेलते-कूदते बड़े होते। यहीं लोकगीत गाए जाते, लोककथाएं सुनाई जातीं और जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचते। बुजुर्ग बताते थे कि कौन-सी गाय किस नस्ल की है, किस बैल की चाल सबसे तेज है, किस मौसम में कौन-सी घास काटनी चाहिए और जंगल से कितना लेना है, कितना छोड़ना है। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता था। यह पीढ़ियों से गोठ की चौखट पर हस्तांतरित होता था। यदि पहाड़ की रीढ़ महिलाएं थीं, तो उनका सबसे बड़ा कार्यस्थल गोठ था। सुबह अंधेरा रहते ही घास काटने जंगल जाना, सिर पर भारी गठरी लेकर लौटना, पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, गोबर साफ करना और खाद तैयार करनाकृयह सब रोजमर्रा की दिनचर्या थी। गोठ महिलाओं के श्रम, धैर्य और त्याग का जीवंत प्रतीक था। आज मशीनों और डेयरी उत्पादों के दौर में शायद उस मेहनत की कल्पना करना भी कठिन है। आज दुनिया आर्गेनिक फार्मिंग की बात करती है, लेकिन पहाड़ इसे सदियों पहले जी चुका था। गोठ में रहने वाले पशुओं का गोबर खेतों की उर्वरता बढ़ाता था। खेतों से अनाज आता था। अनाज का भूसा फिर पशुओं के चारे में जाता था। जंगल से घास आती थी, लेकिन जंगल को नुकसान पहुंचाए बिना। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन का ऐसा माडल था, जिसे आज टिकाऊ विकास कहा जाता है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद विकास की उम्मीदें जगीं, लेकिन पलायन थम नहीं सका। रोजगार की तलाश में युवा शहरों की ओर निकल गए। खेती छूटती गई। बैल ट्रैक्टर से हार गए। गायों की जगह बाजार का दूध आने लगा। धीरे-धीरे गोठों के दरवाजे बंद होने लगे। आज हजारों गांव ऐसे हैं, जहां कभी दर्जनों गोठ हुआ करते थे, लेकिन अब उनमें केवल टूटी दीवारें बची हैं। कई जगहों पर वह जंगली जानवरों का ठिकाना बन चुके हैं। जब गोठ खत्म हुए तो केवल पशुपालन नहीं घटा। खत्म हो गयाकृ खेतों का प्राकृतिक खाद चक्र, पारंपरिक बीजों की खेती, स्थानीय दुग्ध अर्थव्यवस्था, सामूहिक श्रम की संस्कृति, लोकगीतों और लोककथाओं का जीवंत मंच और बच्चों का प्रकृति से रिश्ता। यानी गोठ के साथ पूरा ग्रामीण जीवन बदल गया। आज यदि उत्तराखंड को पलायन रोकना है तो केवल सड़क और भवन बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक तकनीक, डेयरी उद्योग, जैविक खेती और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना होगा। आज होमस्टे की तरह गोठ अनुभव पर्यटन विकसित किया जा सकता है, जहां पर्यटक पहाड़ी जीवन, पशुपालन, जैविक खेती और स्थानीय भोजन का अनुभव करें। पुराने गोठों का संरक्षण कर उन्हें ग्रामीण संस्कृति के संग्रहालय, प्रशिक्षण केंद्र या सामुदायिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। पहाड़ का दर्द केवल खाली होते गांव नहीं हैं। दर्द यह भी है कि अब शाम ढलते ही कहीं दूर से गायों की घंटियां नहीं सुनाई देतीं, बच्चे गोठ की आग के पास बैठकर दादी की कहानियां नहीं सुनते, बुजुर्ग अब पशुओं के नाम लेकर उन्हें पुकारते नहीं,गोठ की टूटी दीवारें आज भी खड़ी हैं, मानो अपने लोगों की राह देख रही हों। वह पूछती हैंकृक्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को पीछे छोड़ देना है? क्योंकि सच तो यह है कि जब तक गोठ जीवित थे, तब तक पहाड़ केवल बसता नहीं था, बल्कि सांस लेता था और यदि पहाड़ को अपनी आत्मा बचानी है, तो उसे गोठों की स्मृतियों को केवल इतिहास नहीं, भविष्य की विकास नीति का हिस्सा भी बनाना होगा।

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