बुधवार, 8 जुलाई 2026
‘चौलाई’ है पहाड़ का ‘लाल सोना’
हमने खेतों से चौलाई को निकाला और दुनिया ने सिर आंखों पर बैठा दिया
पहाड़ में गांवों के खेतों से गायब होती लाल-बैंगनी चौलाई की है यह कहानी
दुनिया कर रही सुपरफूड की तलाश, सदियों से उगता है पहाड़ के खेतों में
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में जब बरसात के बाद खेत लाल और बैंगनी रंग की लंबी-लंबी बालियों से भर जाते हैं, तो किसान समझ जाते हैं कि मर्छू, यानी चौलाई की फसल तैयार है। कभी पहाड़ के लगभग हर गांव में इसकी खेती होती थी, लेकिन आधुनिक खेती, पलायन और बदलती खान-पान की आदतों ने इस पारंपरिक फसल को धीरे-धीरे खेतों से दूर कर दिया है। विडंबना यह है कि जिसे पहाड़ का किसान कभी सामान्य अनाज मानता था, आज वही चौलाई दुनिया भर में सुपरफूड के रूप में पहचानी जा रही है।
चौलाई प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और फाइबर से भरपूर होती है। ग्लूटेन-फ्री होने के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। उत्तराखंड में मर्छू के दानों से लड्डू, चिक्की, खीर और आटा बनाया जाता है। इसकी हरी पत्तियों की स्वादिष्ट सब्जी भी तैयार की जाती है। त्योहारों और व्रत-उपवास के दिनों में भी चौलाई का विशेष महत्व रहा है। चौलाई की खेती कम पानी और सीमित संसाधनों में भी अच्छी होती है। पहाड़ी क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी यह अच्छी पैदावार देती है। यदि इसकी वैज्ञानिक खेती, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग की जाए तो यह किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
एक समय था जब हर गांव में चौलाई की लाल बालियां खेतों की शोभा बढ़ाती थीं। आज पलायन और खेती से बढ़ती दूरी के कारण इसकी खेती लगातार घट रही है। नई पीढ़ी इसके स्वाद और महत्व से भी अनजान होती जा रही है। मिलेट्स और पारंपरिक अनाजों को बढ़ावा देने की राष्ट्रीय पहल के बीच उत्तराखंड की चौलाई को भी नई पहचान मिल सकती है। यदि सरकार, कृषि विभाग और स्वयं सहायता समूह मिलकर इसके मूल्य संवर्धन पर काम करें तो ष्उत्तराखंड चौलाईष् देश-विदेश के बाजारों में एक मजबूत ब्रांड बन सकती है।
मर्छू या चौलाई केवल एक फसल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की कृषि परंपरा, पोषण सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, जिस फसल को कभी सामान्य समझकर भुलाया जा रहा था, वही आज आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में फिर से सम्मान पा रही है। अब जरूरत इस बात की है कि पहाड़ के खेतों में एक बार फिर चौलाई की लाल बालियां लहराएं और किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले।
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