बुधवार, 8 जुलाई 2026

‘नायक’ आंदोलन से सत्ता तक बना ‘मोहरा’

यूकेडी के साथ हुआ उत्तराखंड आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक छल आंदोलन यूकेडी ने खड़ा किया, सत्ता की फसल भाजपा-कांग्रेस ने काटी आंदोलन की मशाल से सत्ता के अंधियारे तक एक क्षेत्रीय दल की त्रासदी देहरादून। राजनीति में एक कहावत हैकृबैल जितना सीधा होगा, हल उसी के कंधों पर रखा जाएगा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास पढ़ते समय यह कहावत बार-बार याद आती है। सवाल केवल यह नहीं कि उत्तराखंड किसने बनाया, बल्कि यह भी है कि जिस दल ने राज्य आंदोलन की आग जलाए रखी, वह सत्ता के दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही हाशिए पर कैसे चला गया? यह कहानी केवल चुनावी हार की नहीं है। यह कहानी राजनीतिक दूरदर्शिता और रणनीतिक भूलों की है। यह कहानी उस क्षेत्रीय दल की है, जिसने उत्तराखंड की अस्मिता को जनांदोलन बनाया, लेकिन राजनीतिक शतरंज की बिसात पर अपने ही मोहरे गंवा बैठा। बता दें कि वर्ष 1994 का उत्तराखंड आंदोलन अपने उफान पर था। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और शहरों की सड़कों पर एक ही मांग थीकृअलग उत्तराखंड राज्य। उस दौर में उत्तराखंड क्रांति दल केवल एक राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि आंदोलन की धड़कन था। जनता की पहली उम्मीद, युवाओं का पहला मंच और राज्य निर्माण का सबसे मुखर राजनीतिक चेहरा। उस समय हालात ऐसे थे कि उत्तराखंड में यूकेडी की स्वीकार्यता किसी समानांतर राजनीतिक सत्ता से कम नहीं थी। दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय दल आंदोलन की दिशा को लेकर असमंजस में दिख रहे थे। स्थानीय स्तर पर उनके कई नेता खुलकर नेतृत्व करने से बच रहे थे। यानी जनभावनाओं का पूरा केंद्र यूकेडी थी और यहीं से शुरू हुआ खेल और यूकेडी समझ ही नहीं पाई। जब आंदोलन अपने चरम पर था, तभी उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन हुआ। इसे आंदोलन को व्यापक बनाने का प्रयास बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में वर्षों से यह चर्चा रही है कि यहीं से यूकेडी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर पड़ने लगी। यूकेडी के झंडे की जगह संघर्ष समिति का बैनर दिखाई देने लगा। पार्टी का अलग संगठनात्मक चेहरा धुंधला पड़ गया। आंदोलन का नेतृत्व सामूहिक मंच के हवाले हो गया। यही वह मोड़ था, जहां आंदोलन की कमान तो यूकेडी के पास रही, लेकिन उसकी राजनीतिक ब्रांडिंग धीरे-धीरे उसके हाथ से फिसलती चली गई। राजनीति में भावनाएं जरूरी होती हैं, लेकिन केवल भावनाओं से सत्ता नहीं मिलती। सत्ता के लिए रणनीति चाहिए। 1996 का लोकसभा चुनाव आया। )षिकेश स्थित आईडीपीएल में हुई बैठक में संयुक्त संघर्ष समिति ने नारा दिया राज्य नहीं तो चुनाव नहीं। नारा सुनने में क्रांतिकारी था। मकसद केंद्र सरकार पर दबाव बनाना था। यूकेडी ने इसे आंदोलन की नैतिक लड़ाई मानकर पूरी ताकत चुनाव बहिष्कार में झोंक दी। लेकिन यहीं राजनीति ने अपना असली रंग दिखाया और यूकेडी सड़कों पर रही और भाजपा और कांग्रेस बैलेट पर पहुंच गईं। एक तरफ यूकेडी चुनाव का विरोध करती रही। दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस बिना किसी हिचकिचाहट के चुनाव मैदान में उतर गईं। मतदान प्रतिशत कम रहा। आंदोलन का असर भी साफ दिखा। लेकिन लोकतंत्र में इतिहास नारे नहीं, मतपेटियां लिखती हैं। कम मतदान के बावजूद राष्ट्रीय दल चुनाव जीत गए। यानी जिस आंदोलन को खड़ा करने में यूकेडी ने अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी लगा दी, उसी आंदोलन की जनभावनाओं का चुनावी लाभ भाजपा और कांग्रेस अपने खाते में दर्ज कराने में सफल रहीं। यूकेडी के हिस्से आया संघर्ष और राष्ट्रीय दलों के हिस्से आई सत्ता। यहीं से उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास जन्म लेता है, जिस दल ने अलग राज्य का सपना गांव-गांव पहुंचाया, वह सत्ता की दौड़ से बाहर होता चला गया और जिन राष्ट्रीय दलों पर कभी आंदोलन से दूरी बनाने के आरोप लगे, वही आगे चलकर उत्तराखंड की सत्ता के सबसे बड़े दावेदार बन गए। आंदोलन का नैतिक श्रेय यूकेडी के पास रहा, लेकिन राजनीतिक लाभ भाजपा और कांग्रेस के खाते में दर्ज होता गया। क्या यह राजनीतिक मासूमियत थी या रणनीतिक आत्मघात? आज भी यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। क्या यूकेडी ने आंदोलन को राजनीति से अलग मानने की भूल की? क्या उसे यह समझने में देर हो गई कि जनांदोलन और चुनावी राजनीति दो अलग-अलग यु( क्षेत्र होते हैं? क्या उसने विरोधियों की राजनीतिक चाल को बहुत देर से पहचाना? या फिर क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ते-लड़ते उसने सत्ता की राजनीति को महत्व ही नहीं दिया? इन सवालों के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि इतिहास इस मोड़ को यूकेडी की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक के रूप में याद करता है। उत्तराखंड बनने के 25 वर्ष बाद भी यह अध्याय केवल इतिहास नहीं है। यह हर उस क्षेत्रीय दल के लिए चेतावनी है, जो जनभावनाओं का नेतृत्व तो करता है, लेकिन उन्हें चुनावी ताकत में बदलने की रणनीति नहीं बना पाता। राजनीति में संघर्ष जरूरी है, लेकिन संघर्ष को सत्ता तक पहुंचाने की कला उससे भी ज्यादा जरूरी होती है। उत्तराखंड आंदोलन ने राज्य दिया, लेकिन राजनीति ने यह भी सिखा दिया कि जो केवल मशाल उठाता है, जरूरी नहीं कि मंजिल तक पहुंचने का श्रेय भी उसी को मिले और शायद इसी कारण उत्तराखंड की राजनीति में आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है। क्या यूकेडी को जनता ने हराया था, या वह राजनीतिक शतरंज की ऐसी चाल में फंस गई, जहां जीत किसी और की पहले से तय थी?

कोई टिप्पणी नहीं: