मंगलवार, 21 जुलाई 2026

उत्तराखंड में ‘इलेक्शन मोड’ आन

भाजपा हैट्रिक की तैयारी में और कांग्रेस ने रची सत्ता की व्यूह रचना भाजपा का विकास कार्ड पर कांग्रेस का पलायन व रोजगार पर वार चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कसौटी पर होगी सत्ता की असली परीक्षा देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन राज्य की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। एक ओर भाजपा लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करने, बूथ स्तर तक पहुंच बनाने और स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं, मजबूत संगठन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में किए गए कार्य उसे फिर सत्ता तक पहुंचाएंगे। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, पेपर लीक, स्वास्थ्य और पहाड़ों से जुड़े बुनियादी सवालों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी उसका बूथ नेटवर्क और संगठनात्मक ढांचा है। पार्टी लंबे समय से बूथ प्रबंधन, लाभार्थी संपर्क और कार्यकर्ता-आधारित चुनावी माडल पर काम करती रही है। चुनाव से पहले भी संगठन को गांव-गांव और घर-घर तक सक्रिय करने की कवायद तेज है। भाजपा का आकलन है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उसे चुनावी बढ़त दिला सकता है। सत्ता में लगातार दो कार्यकाल पूरे करने के बाद किसी भी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से स्थानीय असंतोष की चुनौती आती है। कई क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, पेयजल, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दे अभी भी प्रमुख चुनावी विषय बने हुए हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती हैं। ऐसे में भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन भी एक अहम चुनौती हो सकता है। कांग्रेस इस बार केवल सरकार विरोधी राजनीति तक सीमित रहने के बजाय बूथ संगठन, मेनिफेस्टो और जनसंपर्क पर विशेष जोर देती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व ने संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी तैयारी पर विशेष बल दिया है। यदि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत कर पाती है, तो कई सीटों पर मुकाबला पहले से अधिक कड़ा हो सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार इन मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। युवाओं के लिए रोजगार और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, पलायन और पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं, पर्यटन, चारधाम और स्थानीय अर्थव्यवस्था, महिला सुरक्षा और स्वरोजगार, आपदा प्रबंधन और पुनर्वास, महंगाई और किसान हित प्रमुख हैं। भाजपा की रणनीति विकास, संगठन और नेतृत्व पर केंद्रित रहने की संभावना है, जबकि कांग्रेस स्थानीय असंतोष, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और संगठन विस्तार के जरिए चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल भी कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2027 का चुनाव केवल नारों का नहीं, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट बनाम जनभावनाओं की लड़ाई होगा। भाजपा का लक्ष्य अपने मजबूत संगठन को वोट में बदलना होगा, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह सरकार विरोधी रुझानों को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पाए। यानी कि प्रचंड बहुमत का दावा और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदकृदोनों की असली परीक्षा अब चुनावी मैदान में होगी। उत्तराखंड की राजनीति का अगला अध्याय बूथों पर लिखा जाएगा, जहां अंतिम फैसला मतदाता करेगा।

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