शुक्रवार, 7 अगस्त 2026
काकरोच पार्टी का नया ‘स्टंट’
अब क्या बोलती पब्लिक
अब सीजीपी देश की जनता के कंधे पर बंदूक रखकर चलाएगी राजनीति
काकरोच जनता पार्टी का नया दांव या नई राजनीतिक भाषा की तलाश
जनता से सीधे संवाद का अभियान, सवाल पूछना व जवाब सुनना बराबर
नई दिल्ली। राजनीति बदल रही है। पहले नेता मंच से बोलते थे और जनता सुनती थी। फिर सोशल मीडिया आया, जहाँ नेता भी बोले और जनता ने भी जवाब देना शुरू किया। अब कुछ राजनीतिक दल एक कदम और आगे बढ़ रहे हैं। वह कह रहे हैंकृअब क्या बोलती पब्लिक? काकरोच जनता पार्टी ने इसी नाम से अपना नया जनसंवाद अभियान शुरू किया है। नाम जितना अलग है, संदेश भी उतना ही अलग दिखाने की कोशिश की जा रही है। दावा है कि पार्टी जनता की राय सीधे सुनेगी, शिकायतें दर्ज करेगी और उन्हीं के आधार पर अपनी राजनीतिक रणनीति तय करेगी। सवाल यह नहीं है कि अभियान का नाम क्या है। सवाल यह है कि क्या राजनीति सचमुच जनता को सुनना चाहती है, या केवल जनता को यह एहसास दिलाना चाहती है कि उसे सुना जा रहा है?
यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। देश में चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि भरोसे और उम्मीद के बीच भी लड़ा जाता है। अकेले उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और पहाड़-मैदान का संतुलनकृये ऐसे मुद्दे हैं जो हर चुनाव में लौट आते हैं। ऐसे में यदि कोई दल अब क्या बोलती पब्लिक? का अभियान चलाता है, तो जनता भी शायद यही पूछेगीकृकि क्या हमारी बात केवल रिकार्ड होगी या उस पर कार्रवाई भी होगी? राजनीतिक अभियानों का इतिहास बताता है कि हर चुनाव से पहले संवाद यात्रा, जन आशीर्वाद यात्रा, परिवर्तन यात्रा, विकास यात्रा और जन संपर्क अभियान निकलते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही संवाद की गति भी अक्सर धीमी पड़ जाती है। यही वजह है कि जनता अब केवल अभियान नहीं देखती, उसका परिणाम भी देखना चाहती है।
काकरोच जनता पार्टी का यह अभियान यदि केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहता है, तो वह भीड़ तो जुटा सकता है, लेकिन विश्वास नहीं। यदि यह गाँव-गाँव, कस्बों और शहरों तक जाकर लोगों की वास्तविक समस्याएँ सुनता है, उन्हें दस्तावेज बनाता है और समाधान की दिशा में स्पष्ट रोडमैप देता है, तब यह अभियान राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। लेकिन राजनीति में एक और सच है। जनता केवल बोलना नहीं चाहती, वह चाहती है कि उसकी बात सुनी भी जाए और उससे भी आगे, उस पर अमल भी हो। आज का मतदाता पहले से अधिक जागरूक है। वह किसी भी दल से एक ही सवाल पूछता हैकृआपकी प्राथमिकता क्या है? केवल सत्ता या समाज? यदि अब क्या बोलती पब्लिक? अभियान जनता की आवाज को चुनावी नारे से आगे ले जाकर नीति निर्माण तक पहुँचाने का प्रयास करता है, तो यह एक सार्थक पहल साबित हो सकती है। लेकिन यदि यह केवल प्रचार का नया पैकेज बनकर रह गया, तो चुनाव बीतने के साथ इसका असर भी फीका पड़ जाएगा।
राजनीति में सबसे कठिन काम बोलना नहीं, सुनना होता है और उससे भी कठिन काम है सुनी हुई बात को स्वीकार करना। इसलिए इस अभियान की असली परीक्षा पोस्टर, नारे और सोशल मीडिया की पहुँच से नहीं होगी। उसकी परीक्षा तब होगी, जब जनता अपने सवाल रखेगी और पार्टी उनके जवाब देने के साथ-साथ समाधान की दिशा भी दिखाएगी। आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ी आवाज किसी नेता की नहीं होतीकृसबसे बड़ी आवाज जनता की होती है और हर चुनाव में आखिरी शब्द भी वही बोलती है मतपेटी के भीतर।
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