शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

‘नई बोतल में पुरानी शराब वाला पैंतरा’

कांग्रेस की नई कार्यकारिणी बचा पाएगी उत्तराखंड में डूबती नैया सोशल मीडिया व बैठकों से निकलकर मैदानी परीक्षा में उतरे नेता संतुलन के नाम पर बनाई गई कांग्रेस की इस नई टीम का पूरा सच चुनावी रण से पहले संगठन में ऊर्जा या पुराने समीकरणों की वापसी देहरादून। विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही उत्तराखंड की राजनीति में संगठनात्मक गतिविधियां भी रफ्तार पकड़ चुकी हैं। इसी क्रम में उत्तराखंड कांग्रेस ने अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। नई टीम के गठन को पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी का अहम कदम बताया है, लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या यह कार्यकारिणी कांग्रेस में नई जान फूंकेगी या फिर केवल पुराने चेहरों और गुटीय संतुलन का दस्तावेज बनकर रह जाएगी। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व का दावा है कि नई कार्यकारिणी में अनुभव और युवा ऊर्जा का संतुलन बनाया गया है। विभिन्न क्षेत्रों, जातीय और सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा गया है ताकि पार्टी बूथ स्तर तक मजबूत हो सके। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर है कि संगठन में जगह पाने वाले नेताओं की असली परीक्षा अब मैदान में होगी। उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से संगठनात्मक कमजोरी से जूझती रही है। कई जिलों में पार्टी के पदाधिकारी सक्रिय नहीं दिखे, जबकि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल भी लगातार चर्चा का विषय रहा। भाजपा जहां लगातार बूथ सशक्तिकरण अभियान चला रही है, वहीं कांग्रेस अब नई कार्यकारिणी के सहारे संगठन को गति देने की कोशिश कर रही है। नई टीम के सामने सबसे पहला काम निष्क्रिय इकाइयों को सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाना होगा। राजनीति में कार्यकारिणी की घोषणा जितनी आसान होती है, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल पद बांटने की नहीं बल्कि पदाधिकारियों से परिणाम लेने की है। प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अब हर पदाधिकारी के काम का मूल्यांकन होना चाहिए जो नेता अपने क्षेत्र में संगठन मजबूत नहीं कर पाए, उन्हें केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बचाने की बजाय जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। भाजपा की लगातार बैठकों, बूथ जीतो अभियान, विकास यात्रा की तैयारी और चुनावी रणनीति के बीच कांग्रेस की नई कार्यकारिणी को पार्टी का जवाब माना जा रहा है। भाजपा पहले ही चुनावी मोड में दिखाई दे रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल नई सूची जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। उसे गांव-गांव, वार्ड-वार्ड और बूथ-बूथ तक अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी। यदि नई कार्यकारिणी में युवाओं और महिलाओं को पर्याप्त जिम्मेदारी मिली है, तो यह कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। उत्तराखंड के मतदाताओं में बड़ी संख्या युवा वोटरों की है, जबकि महिला मतदाता भी चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इन्हें केवल नाममात्र की जिम्मेदारी देकर छोड़ दिया गया, तो इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा। उत्तराखंड कांग्रेस में समय-समय पर गुटबाजी की चर्चा होती रही है। नई कार्यकारिणी के गठन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या सभी नेता मिलकर चुनाव लड़ेंगे या फिर अंदरूनी खींचतान संगठन की गति को प्रभावित करेगी। यदि सभी वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई देते हैं और जिला स्तर तक समन्वय बना रहता है, तो कांग्रेस के लिए यह कार्यकारिणी चुनावी मजबूती का आधार बन सकती है। राजनीति में किसी भी संगठन की असली पहचान उसके पदाधिकारियों की सूची से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी सक्रियता से होती है। नई कार्यकारिणी की घोषणा के बाद अब कांग्रेस के पास बहाने कम और जिम्मेदारियां ज्यादा हैं। प्रदेश के बेरोजगार युवाओं, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और स्थानीय मुद्दों पर यदि संगठन लगातार जनता के बीच दिखाई देता है, तभी नई टीम का असर चुनाव में नजर आएगा। उत्तराखंड कांग्रेस की नई कार्यकारिणी पाटरग् के लिए एक नई शुरुआत का अवसर है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल नई टीम बना देने से जीत नहीं मिलती। जीत तब मिलती है जब संगठन बूथ तक सक्रिय हो, कार्यकर्ता उत्साहित हों और जनता को यह भरोसा हो कि विपक्ष केवल सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि विकल्प भी प्रस्तुत कर रहा है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि नई कार्यकारिणी अगले कुछ महीनों में कागज से निकलकर मैदान में कितनी सक्रिय दिखाई देती है। विधानसभा चुनाव से पहले यही सक्रियता तय करेगी कि कांग्रेस संगठनात्मक मजबूती की ओर बढ़ रही है या फिर यह बदलाव केवल पदों के पुनर्वितरण तक सीमित रह जाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं: