गुरुवार, 13 अगस्त 2026

सरकारी ‘सर्कस’ में सयारा का ‘सरेंडर’

---डेढ़ लाख के बजट ने तोड़ दिया उत्तराखंड की बेटी का इंटरनेशनल सपना ---रोमानिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो स्पर्धा के लिए हुआ था चयन ---युवा संवाद में छात्रा सयारा के आंसुओं ने सरकारी वादों की पोल खोल दी ---तिरंगा लहराने का सपना देखने वाली बेटी को अफसरों ने मोहताज बनाया देहरादून। उत्तराखंड में खेल प्रतिभाओं और सरकारी व्यवस्था को लेकर एक छात्रा की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने कही गई बात ने सियासी बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री से युवा संवाद कार्यक्रम के दौरान देहरादून की छात्रा सयारा ने भावुक होकर बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद उसका चयन रोमानिया में होने वाली अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता के लिए हुआ था, लेकिन करीब डेढ़ लाख रुपये की व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी। छात्रा ने मुख्यमंत्री के सामने कहा कि उससे करीब 1.50 लाख रुपये मांगे गए थे और वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं खेल पाई। छात्रा के भावुक होने पर मुख्यमंत्री ने उसे शांत कराया और अधिकारियों से मामले की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए। इस पूरे घटनाक्रम ने सवाल खड़ा किया है कि यदि किसी सरकारी या खेल व्यवस्था में एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद केवल आर्थिक संसाधनों के अभाव में रुक जाती है, तो खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की सरकारी नीतियां आखिर किस हद तक जमीन पर पहुंच रही हैं? रिपोर्टों के मुताबिक, रोमानिया की प्रतियोगिता में जाने के लिए यात्रा सहित कुल खर्च करीब 3.70 लाख रुपये बताया गया था। इसमें लगभग 1.70 लाख रुपये की सहायता काउंसिल की ओर से होने की बात थी, जबकि करीब 1.50 लाख रुपये छात्रा को स्वयं जुटाने थे। आर्थिक व्यवस्था नहीं होने के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी। यानी इस मामले में डेढ़ लाख एक रकम भर नहीं है। यह उस सवाल का प्रतीक बन गया है कि प्रतिभा और आर्थिक क्षमता के बीच सरकार कितनी मजबूत पुल बना पाती है। छात्रा की बात सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे सरकार की खेल व्यवस्था पर हमला करने के लिए मुद्दा बना लिया। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के सामने ही एक बेटी ने व्यवस्था में भ्रष्टाचार की शिकायत रखी। लेकिन इसी मामले में एक महत्वपूर्ण सावधानी भी सामने आई है। बाद की रिपोर्टों में छात्रा की बात को रिश्वत के रूप में प्रचारित किए जाने पर सवाल उठे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, मामला प्रतियोगिता में जाने के लिए आवश्यक वित्तीय व्यवस्था का था और छात्रा ने बाद में स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के सामने वह अपनी पूरी बात नहीं रख पाई थी। इसलिए फिलहाल इसे सीधे रिश्वतखोरी साबित मानना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि डेढ़ लाख रुपये की आवश्यकता क्यों पड़ी, किस संस्था की क्या जिम्मेदारी थी और खिलाड़ी को उपलब्ध सरकारी अथवा खेल सहायता समय पर क्यों नहीं मिल सकी। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को छात्रा के स्कूल और उसके ताइक्वांडो प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी जुटाने के निर्देश दिए हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि जांच में यह सामने आता है कि खिलाड़ी को नियमानुसार मिलने वाली सहायता नहीं मिली, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि रकम वास्तव में प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए खिलाड़ी की अपनी हिस्सेदारी थी, तो फिर यह भी देखना होगा कि आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि चयन के बाद पैसे के अभाव में उनका अंतरराष्ट्रीय अवसर न छूटे। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की राजनीति में युवा, रोजगार और प्रतिभाओं का पलायन पहले से बड़े मुद्दे हैं। सरकार खेलों में सुविधाओं और प्रतिभाओं को अवसर देने की बात करती रही है। दूसरी ओर विपक्ष को ऐसे मामलों के जरिए यह सवाल उठाने का मौका मिल रहा है कि घोषणाओं और जमीन पर मौजूद व्यवस्था के बीच कितना अंतर है।इस पूरे विवाद में सबसे जरूरी बात राजनीति से आगे की है। एक बच्ची राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। फिर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा उसके सामने खुलता है। लेकिन दरवाजे के बाहर खड़ा सवाल सिर्फ 1.50 लाख रुपये का रह जाता है। अगर प्रतिभा के सामने सबसे बड़ी बाधा पैसा बन जाए, तो फिर सवाल केवल खिलाड़ी का नहीं रहताकृपूरे खेल तंत्र की क्षमता का हो जाता है। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री के सामने उठी इस आवाज का जवाब सिर्फ जांच के आदेश तक सीमित रहता है या उत्तराखंड की खेल व्यवस्था में ऐसा रास्ता बनता है, जिसमें किसी खिलाड़ी का अंतरराष्ट्रीय सपना आर्थिक मजबूरी के कारण अधूरा न रह जाए।

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