गुरुवार, 13 अगस्त 2026

दिल्ली में ‘दरबार’ दून में ‘इंतजार’

‘हाईकमान’ के सहारे 2027 जीतेगी उत्तराखंड कांग्रेस, आगामी बैठक में चर्चा होगी उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति देहरादून में नहीं, दिल्ली की बैठक में क्यों तय हो रही दिल्ली दरबार में जुटेंगे दिग्गज, 2027 की जमीन पर रणनीति को लेकर बढ़ी हलचल देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति इन दिनों देहरादून की सड़कों से ज्यादा दिल्ली के बैठक कक्षों में दिखाई दे रही है। प्रदेश की सियासत में अगले विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही कांग्रेस के भीतर बैठकों का दौर बढ़ गया है। दिल्ली में होने वाली बैठकों को लेकर पार्टी के नेताओं की सक्रियता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि उत्तराखंड कांग्रेस की चुनावी रणनीति आखिर तय कहां हो रही हैकृदेहरादून में या दिल्ली में? कांग्रेस के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव महज सत्ता वापसी की लड़ाई नहीं है। यह संगठन के भीतर नेतृत्व, गुटबाजी और चुनावी रणनीति की भी परीक्षा है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली बैठकों को प्रदेश कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के खिलाफ मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार करने की है। लेकिन उससे पहले कांग्रेस को अपने घर के भीतर की जमीन मजबूत करनी होगी। कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व के साथ बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। टिकट को लेकर दावेदारी शुरू होनी है। विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना है। संभावित प्रत्याशियों का आकलन होना है और सबसे बड़ी बातकृकांग्रेस को यह तय करना है कि चुनाव किस चेहरे और किस मुद्दे के आसपास लड़ा जाएगा। दिल्ली में बैठकर होने वाली चर्चा का असर स्वाभाविक रूप से उत्तराखंड संगठन पर पड़ेगा। लेकिन यहीं कांग्रेस के सामने एक पुराना सवाल भी खड़ा हैकृ कि क्या दिल्ली से तय रणनीति पहाड़ की जमीन पर भी उतनी ही प्रभावी होगी? कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कमी नहीं है। बेरोजगारी है। पलायन है। भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं की नाराजगी है। स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौती है। आपदा और सड़क जैसी समस्याएं हैं। महंगाई और स्थानीय रोजगार का सवाल है। लेकिन मुद्दे तभी चुनावी ताकत बनते हैं जब पार्टी उन्हें एक आवाज में जनता तक पहुंचाए। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा है। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। कई नेता अपने-अपने तरीके से सक्रिय हैं। समर्थकों की अपनी-अपनी राजनीतिक पसंद है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा कि 2027 के लिए कांग्रेस एकजुट चेहरा कैसे पेश करेगी? उत्तराखंड कांग्रेस में नेतृत्व का सवाल हमेशा से संवेदनशील रहा है। कौन चुनाव का नेतृत्व करेगा? किस नेता को संगठन की बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी? किसे टिकट मिलेगा? किस नेता की भूमिका प्रदेश स्तर पर होगी? और किसकी भूमिका विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहेगी? इन सवालों के जवाब भले ही अभी सार्वजनिक न हों, लेकिन कांग्रेस के भीतर इन पर चर्चा तेज होना तय है। क्योंकि चुनावी राजनीति में टिकट की घोषणा से पहले ही टिकट की राजनीति शुरू हो जाती है और उत्तराखंड में यह राजनीति जितनी देहरादून में होती है, उतनी ही दिल्ली में भी। कांग्रेस नेतृत्व अगर दिल्ली की बैठक से स्पष्ट रणनीति के साथ निकलता है तो इसका संदेश प्रदेश संगठन में जाएगा। विधानसभा स्तर पर सक्रियता बढ़ सकती है। दावेदारों को संकेत मिल सकते हैं। संगठनात्मक फेरबदल की तस्वीर साफ हो सकती है और पार्टी सरकार के खिलाफ मुद्दों को लेकर ज्यादा आक्रामक हो सकती है। लेकिन केवल दिल्ली की बैठक से चुनाव नहीं जीता जाता। चुनाव जीतने के लिए पहाड़ के गांव तक जाना पड़ेगा। चौक-चौराहों पर जनता के सवाल सुनने होंगे। युवा के हाथ में रोजगार का सवाल पकड़ना होगा। महिला के सामने महंगाई और सुरक्षा के सवाल पर जवाब रखना होगा। पलायन से खाली होते गांवों के बीच जाकर पूछना होगा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो बदलेगा क्या? भाजपा के पास सरकार है, संगठन है और सत्ता की मशीनरी का अनुभव है। कांग्रेस के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि उसे विपक्ष में रहते हुए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के साथ अपना संगठन भी मजबूत करना है। सबसे बड़ी गलती कांग्रेस यह करेगी कि वह चुनाव को केवल भाजपा हटाओ के नारे तक सीमित कर दे। जनता पूछेगीकृकि भाजपा को हटाकर आप करेंगे क्या? कांग्रेस को इस सवाल का जवाब अभी से तैयार करना होगा। सिर्फ सरकार की कमियां गिनाना आसान है। विकल्प देना मुश्किल। इसलिए दिल्ली में होने वाली बैठक को सिर्फ एक सामान्य संगठनात्मक बैठक मानना शायद सही नहीं होगा। यह बैठक कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक दिशा तय करने का मौका है। अगर केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के नेताओं को साथ बैठाकर स्पष्ट रणनीति बनाई, गुटों के बीच संवाद बढ़ाया, संगठन को सक्रिय किया और चुनावी मुद्दों पर सहमति बनाई तो कांग्रेस के लिए यह बैठक अहम मोड़ साबित हो सकती है। लेकिन अगर बैठक के बाद भी वही पुराने आरोप-प्रत्यारोप, टिकट की खींचतान और नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता जारी रही तो दिल्ली की बैठक भी कांग्रेस की लंबी राजनीतिक बैठकों की सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी। उत्तराखंड की राजनीति अब 2027 की ओर बढ़ रही है। दिल्ली में बैठकर रणनीति बन सकती है। लेकिन उसका फैसला देहरादून में नहीं, पहाड़ की जनता के बीच होगा। वहां सवाल बहुत सीधे हैंकृ कौन लड़ेगा? किस मुद्दे पर लड़ेगा? किस चेहरे के साथ लड़ेगा? और सबसे बड़ा सवालकृ कि अगर जनता ने मौका दिया तो कांग्रेस बदलेगी क्या? दिल्ली की बैठक का असली जवाब इन्हीं सवालों में छिपा है।

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