सोमवार, 17 अगस्त 2026
‘देवभूमि में डर्टी पालिटिक्स’
प्रदेश में आपदा, बदहाल सड़कें और पलायन जैसे गंभीर मुद्दे
वही दिल्ली से लेकर दून तक राजनीतिक बयानबाजी चरम पर
कांग्रेस ने कई मुद्दों को ढाल बनाकर सरकार की घेराबंदी तेज
प्रदेश में राज्य के जमीनी मुद्दे फिलहाल हाशिए पर नजर आ रहे
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड इन दिनों सिर्फ बारिश, आपदा, सड़क और पहाड़ की बदहाल जिंदगी के सवालों से नहीं जूझ रहा, बल्कि सियासत का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। प्रदेश की राजनीति अब देहरादून की सीमाओं से निकलकर दिल्ली तक पहुंचती दिखाई दे रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की ऐसी जंग छिड़ी है, जिसमें विकास और जनसरोकार के मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। भाजपा जहां संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए बेरोजगारी, शिक्षा, पलायन, महंगाई, आपदा और सरकारी व्यवस्थाओं को मुद्दा बना रही है। दोनों दलों की सक्रियता से साफ है कि आने वाले महीनों में प्रदेश की राजनीति और ज्यादा आक्रामक होने वाली है।
राजनीति में आरोप लगना नई बात नहीं है, लेकिन उत्तराखंड में जिस तरह व्यक्तिगत हमले, बयानबाजी और एक-दूसरे की राजनीतिक नीयत पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसने बहस का स्तर जरूर बदल दिया है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर भ्रम फैलाने और राजनीतिक अवसरवाद का आरोप लगा रहा है। विपक्ष सरकार पर जनमुद्दों से ध्यान भटकाने और सत्ता का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए करने का आरोप लगा रहा है।
इस सियासी शोर में असली सवाल यह है कि पहाड़ के गांवों में क्या बदल रहा है? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या सरकारी स्कूल सुरक्षित हैं? क्या पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरी हैं? क्या पलायन रुका है? क्या बरसात में हर साल टूटने वाली सड़क और पुलों की समस्या का स्थायी समाधान हुआ है? इन सवालों के जवाब राजनीतिक नारों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले काम से मिलेंगे।
उत्तराखंड छोटा राज्य जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इसकी राजनीतिक अहमियत लगातार बढ़ी है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का असर सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल्ली की राजनीति में भी उसकी गूंज सुनाई देती है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही उत्तराखंड को 2027 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई की प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं। भाजपा के लिए सत्ता बरकरार रखना चुनौती है तो कांग्रेस के सामने लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के बाद वापसी की चुनौती है। यही वजह है कि प्रदेश के छोटे-बड़े राजनीतिक घटनाक्रम दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व की नजर उत्तराखंड के संगठन, सरकार और विपक्ष की गतिविधियों पर बनी हुई है।
इस लड़ाई का एक नया मैदान सोशल मीडिया भी है। नेताओं के बयान, वीडियो, पोस्ट और आरोप कुछ ही मिनटों में प्रदेशभर में पहुंच रहे हैं। राजनीतिक दल अपने समर्थकों के जरिए नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया की यह आक्रामक राजनीति वास्तव में जनता के सवालों का समाधान करेगी? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है और सत्ता पक्ष का दायित्व जनता को अपने काम का हिसाब देना। लेकिन जब दोनों पक्षों की राजनीति सिर्फ एक-दूसरे को नीचा दिखाने तक सीमित हो जाए, तो लोकतांत्रिक बहस कमजोर होती है।
2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। टिकट के दावेदार सक्रिय हैं। संगठनात्मक बैठकों का दौर चल रहा है। नेताओं के दौरे बढ़ रहे हैं। बूथ स्तर पर समीकरण बनाए जा रहे हैं। पुराने नेताओं की भूमिका और नए चेहरों की संभावनाओं पर चर्चा तेज है। भाजपा के सामने सरकार के कामकाज को लेकर जनता के बीच भरोसा बनाए रखने की चुनौती है। कांग्रेस के सामने सरकार विरोधी माहौल को वोट में बदलने की चुनौती है। क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक समूहों के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की चुनौती है। ऐसे में आने वाले दिनों में बयान और पलटवार और तीखे होंगे।
उत्तराखंड की राजनीति में दिल्ली का प्रभाव हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसला पहाड़, मैदान और गांव-कस्बों की जनता करेगी। जनता यह देखेगी कि कौन उसके मुद्दों पर खड़ा है और कौन सिर्फ चुनाव के समय उसके दरवाजे पर पहुंचता है। देवभूमि को डर्टी पालिटिक्स नहीं, साफ राजनीति चाहिए। आरोपों की राजनीति नहीं, जवाबदेही की राजनीति चाहिए। मंचों पर बड़े-बड़े दावों के बजाय स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार और सुरक्षित जीवन चाहिए। 2027 की लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल यही होगाकृकौन किसे हराएगा, यह बाद की बात है, पहले यह तय होगा कि जनता के असली सवालों पर कौन खड़ा दिखाई देता है। क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति का फैसला दिल्ली के बंद कमरों में नहीं, पहाड़ के गांवों और मैदान के बूथों पर होगा।
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