शनिवार, 8 अगस्त 2026
पहाड़ की बेटी के गले का ‘गलोबंद’
यह गहना नहीं, मां की संदूकची से निकली हुई है एक पूरी पीढ़ी
गले का गलोबंद सिर्फ गहना नहीं, पहाड़ के पीढ़ियों की कहानी
मायके की सोंधी महक, पीढ़ियों का दुलार और धुंधलाती यादें
देहरादून। पहाड़ की महिलाओं के गले में सजा गलोबंद कभी परिवार की पहचान हुआ करता था। सोने-चांदी के छोटे-छोटे टुकड़ों में बुनी यह परंपरा आज फैशन की दुनिया में भले लौट रही हो, लेकिन इसके पीछे छिपी पहाड़ की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। पहाड़ की सुबह जितनी सादगी भरी होती है, वहां की स्त्री का श्रृंगार उतना ही अर्थपूर्ण। माथे की बिंदी, नाक की नथ, कानों के झुमके और गले में सजा गलोबंद यह सिर्फ आभूषण नहीं थे। इनमें पहाड़ की अर्थव्यवस्था, परिवार की हैसियत, कारीगर की मेहनत और महिलाओं की पीढ़ियों पुरानी स्मृतियां दर्ज होती थीं। गलोबंद को देखिए तो पहली नजर में यह गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण लगता है। लेकिन पहाड़ के गांवों में इसकी कहानी इससे कहीं बड़ी रही है।
कभी बेटी की शादी में मायके से आने वाले गहनों में गलोबंद का खास स्थान होता था। मां का गलोबंद बेटी तक पहुंचता था और उसके साथ सिर्फ सोना या चांदी नहीं जाती थीकृजाती थी एक पूरी पीढ़ी की कहानी। दादी ने पहना, मां ने संभाला और बेटी ने विरासत में पाया। यही तो पहाड़ के गहनों की खासियत थी। आज जब बाजार में आभूषण डिजाइन बदल रहे हैं और पारंपरिक गहने आधुनिक फैशन के साथ दोबारा दिखाई देने लगे हैं, तब गलोबंद भी नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बना रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गलोबंद सिर्फ फैशन बनकर रह जाएगा या इसके पीछे की संस्कृति भी बच पाएगी?
परंपरागत गलोबंद के निर्माण में कारीगरी का अपना महत्व रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके डिजाइन, आकार और इस्तेमाल की शैली में अंतर देखने को मिलता है। इसमें धातु के छोटे-छोटे हिस्सों को जोड़कर या कपड़े/धागे के आधार पर सजाकर गले का आभूषण तैयार किया जाता था। इसकी खूबसूरती केवल चमक में नहीं थी। उसकी असली खूबसूरती उस हाथ में थी, जिसने उसे बनाया था। पहाड़ में आभूषण बनाने वाले कारीगरों की अपनी दुनिया थी। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला उनके हुनर और धैर्य की परीक्षा लेती थी। एक-एक डिजाइन के पीछे घंटों की मेहनत होती थी।
आज मशीन से बने आभूषण बाजार में जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं। कीमत भी कई बार कम होती है। ऐसे में हाथ से तैयार पारंपरिक गहनों के सामने बाजार की चुनौती बढ़ी है। लेकिन गलोबंद की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बल्कि नई पीढ़ी ने इसे नए अंदाज में अपनाना शुरू किया है। पहाड़ की पारंपरिक पोशाक के साथ पहना जाने वाला गलोबंद अब सिर्फ गांव की शादी तक सीमित नहीं है। आधुनिक डिजाइनरों ने इसे नए कपड़ों और नए फैशन के साथ जोड़ना शुरू किया है। कई युवतियां इसे साड़ी, सूट और पारंपरिक परिधानों के साथ पहनना पसंद करती हैं। यानी जिस आभूषण को कभी पहाड़ की बहू-बेटियों की पहचान माना जाता था, वह अब शहरों के फैशन में भी जगह बना रहा है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक खतरा भी है।कहीं ऐसा न हो कि गलोबंद बच जाए और उसकी कहानी खो जाए। किस धातु का इस्तेमाल होता था? किस अवसर पर पहना जाता था? इसे कौन बनाता था? शादी में इसका क्या महत्व था? मायके और ससुराल के बीच इसका क्या रिश्ता था? इन सवालों के जवाब भी उसी विरासत का हिस्सा हैं।
पहाड़ के समाज में आभूषण केवल सजने के लिए नहीं होते थे। कई बार वह परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी होते थे। मुश्किल समय में गहने बेचकर परिवार ने अपनी जरूरतें पूरी कीं। लेकिन भावनात्मक मूल्य का कोई बाजार नहीं होता। एक मां के लिए अपनी शादी का गलोबंद सिर्फ एक आभूषण नहीं था। उसमें उसके मायके की यादें थीं। बेटी की शादी में जब वही गहना उसे दिया जाता था तो वह एक तरह से परिवार की स्मृति को आगे बढ़ाना होता था। यही कारण है कि पहाड़ के पुराने संदूकों में रखे गहनों को खोलते समय सिर्फ धातु की चमक नहीं दिखाई देती थी। उनमें पुरानी तस्वीरें, पुरानी शादियां और पुरानी पीढ़ियां दिखाई देती थीं।
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन ने केवल खेत और गांव नहीं बदले। उसने पहनावे और आभूषणों की दुनिया को भी प्रभावित किया जो परिवार गांव से शहर आ गए, उनकी अगली पीढ़ी का जीवन अलग हो गया। पारंपरिक पहनावा रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर होता गया। उसके साथ पारंपरिक गहनों का इस्तेमाल भी कम हुआ। आज कई घरों में दादी-नानी के पुराने गहने संदूकों में सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें पहनने वाली पीढ़ी कम होती जा रही है। इसलिए गलोबंद की कहानी केवल एक आभूषण की कहानी नहीं है। यह उस पहाड़ की कहानी है, जो अपनी पुरानी चीजों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
गलोबंद को बचाने का मतलब यह नहीं कि नई पीढ़ी को पुराने तरीके से ही जीने के लिए कहा जाए। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ बदलती है। जरूरत है कि स्थानीय कारीगरों को बाजार मिले, पारंपरिक डिजाइन का दस्तावेजीकरण हो और स्कूल-कालेजों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में उत्तराखंड के पारंपरिक आभूषणों के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए। क्योंकि जब किसी समाज की चीजें सिर्फ संग्रहालय में रह जाती हैं, तो संस्कृति का एक हिस्सा जीवित होकर भी रोजमर्रा की जिंदगी से गायब हो जाता है। गलोबंद आज फिर फैशन में लौट रहा है। यह अच्छी खबर है। लेकिन उससे भी बड़ी खबर तब होगी जब इसके साथ उसकी कहानी भी लौटे।
धातु की चमक से कहीं ज्यादा इसमें उन हाथों की गर्माहट है, जिन्होंने इसे बनाया। उन माताओं की ममता है, जिन्होंने इसे बेटी को दिया। उन बेटियों की यादें हैं, जिन्होंने इसे संभालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। इसलिए अगली बार जब किसी पहाड़ी महिला के गले में गलोबंद दिखाई दे, तो उसे सिर्फ एक आभूषण मत समझिएगा। उसमें एक गांव है, एक परिवार है, एक मां है, एक बेटी है और पहाड़ की कई पीढ़ियों की कहानी है।
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