शनिवार, 8 अगस्त 2026

ऋषभ पंत की ‘गूगली’

आधी रात को मदद की मांग, मैदान से दूर घर लौटने की छटपटाहट सवाल सिर्फ एक क्रिकेटर का नहीं, पहाड़ लौटने वालों की राह का स्टार क्रिकेटर पंत की आधी रात की पोस्ट ने खड़े किए कई सवाल देहरादून। रात के 12 बजकर 46 मिनट। जब ज्यादातर लोग अपने फोन को एक तरफ रखकर दिन खत्म कर चुके होते हैं, सोशल मीडिया पर भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत की एक पोस्ट सामने आती है। पोस्ट में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद की मांग की जाती है। यह सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं थी। इसे पढ़ने वालों के लिए यह एक अलग तरह की कहानी थी। एक तरफ श्रीलंका का दौरा है। मैदान है। क्रिकेट है। टीम है। वार्मअप मैच हैं। दूसरी तरफ अपने घर लौटने की इच्छा है और उस इच्छा के बीच खड़ी कोई ऐसी परेशानी, जिसके समाधान के लिए राज्य के मुख्यमंत्री तक बात पहुंचानी पड़ रही है। अगर पंत सचमुच दिल्ली से दोबारा उत्तराखंड शिफ्ट होना चाहते हैं, तो सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी दिक्कत है, जिसने उत्तराखंड के इस स्टार क्रिकेटर को आधी रात सोशल मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री से मदद मांगने को मजबूर किया? और यही वह सवाल है, जिस पर क्रिकेट की चमक से बाहर निकलकर बात करने की जरूरत है। ऋषभ पंत का नाम उत्तराखंड से सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ा है कि वह देश के बड़े क्रिकेटरों में शामिल हैं। वह उस पहाड़ से आते हैं, जहां से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाना आसान नहीं होता। पहाड़ में अक्सर एक कहानी सुनाई जाती हैकृबेटा बाहर जाता है, पढ़ता है, नौकरी करता है, बड़ा आदमी बनता है और फिर एक दिन गांव लौटना चाहता है। लेकिन लौटने की राह में कई बार वही पुरानी मुश्किलें खड़ी मिलती हैं। सड़क,व्यवस्था, कागज,जमीन व स्थानीय प्रशासन और सबसे बड़ा सवालकृक्या पहाड़ में वापस आने वाले व्यक्ति के लिए व्यवस्था उतनी ही सहज है, जितनी बाहर जाने वाले के लिए? पंत की पोस्ट को इसी बड़े सवाल के संदर्भ में देखना चाहिए। क्योंकि यह मामला सिर्फ एक सेलिब्रिटी का नहीं है। मान लीजिए किसी आम पहाड़ी परिवार का बेटा वर्षों दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ या किसी दूसरे शहर में रहने के बाद अपने राज्य में लौटना चाहता है। उसे अगर किसी जमीन, घर, दस्तावेज, प्रशासनिक प्रक्रिया या स्थानीय समस्या के समाधान के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें तो उसके पास किसे टैग करने का विकल्प है? क्या वह आधी रात मुख्यमंत्री को टैग करके लिख सकता हैकृमुख्यमंत्री जी, मदद करिए? शायद नहीं। ऋषभ पंत कर सकते हैं क्योंकि उनके पास लाखों लोगों तक पहुंचने वाला सोशल मीडिया है। उनका एक पोस्ट खबर बन जाता है। मुख्यमंत्री तक बात पहुंच जाती है। प्रशासन भी शायद तुरंत सक्रिय हो जाए। लेकिन यहां असली सवाल यही हैकृजिस काम के लिए एक क्रिकेटर को मुख्यमंत्री को सोशल मीडिया पर पुकारना पड़ रहा है, उसी काम के लिए एक सामान्य नागरिक क्या करता होगा? यह सवाल पंत पर नहीं, व्यवस्था पर है और शायद इसीलिए इस पोस्ट को सिर्फ वायरल पोस्ट मानकर आगे बढ़ जाना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड सरकार लगातार प्रवासियों को वापस पहाड़ लाने, निवेश बढ़ाने और रिवर्स माइग्रेशन को प्रोत्साहित करने की बात करती रही है। सरकार चाहती है कि पहाड़ से बाहर गया व्यक्ति वापस आए। अपने गांव में बसे। जमीन का इस्तेमाल करे। रोजगार पैदा करे। लेकिन रिवर्स माइग्रेशन सिर्फ भाषणों से नहीं होता। लोगों को लौटने के लिए भरोसा चाहिए। उन्हें जमीन चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा साफ व्यवस्था चाहिए। उन्हें सड़क चाहिए, इंटरनेट चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए, रोजगार चाहिए और ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी काम के लिए किसी बड़े आदमी की पहचान जरूरी न हो। ऋषभ पंत अगर उत्तराखंड लौटना चाहते हैं तो यह राज्य के लिए खुशी की बात होनी चाहिए। लेकिन उनकी घर वापसी अगर किसी प्रशासनिक अड़चन में फंसती है, तो यह भी सोचने का मौका है कि उन हजारों-लाखों लोगों का क्या होता होगा जो उत्तराखंड लौटना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पंत जैसी आवाज नहीं है। पहाड़ का पलायन केवल गांव खाली होने की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो लौटना चाहते हैं। कई लोग कहते हैं कि पहाड़ छोड़ना आसान है, लौटना मुश्किल। क्यों? क्योंकि बाहर शहर में आपकी पहचान आपकी नौकरी, आपका कारोबार और आपकी मेहनत से बनती है। पहाड़ लौटकर वही व्यक्ति कई बार जमीन, दस्तावेज, स्थानीय व्यवस्था और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच उलझ जाता है और फिर वह सोचता हैकृक्या वापस आना गलती थी? ऋषभ पंत की पोस्ट को इसी नजरिए से पढ़ना चाहिए। यहां किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि उनकी वास्तविक परेशानी क्या है। क्या मामला संपत्ति से जुड़ा है? दस्तावेज से? प्रशासनिक अनुमति से? किसी अन्य प्रक्रिया से? जब तक पंत या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती, तब तक सोशल मीडिया की अटकलों को तथ्य मान लेना पत्रकारिता नहीं होगी। लेकिन एक बात जरूर पूछी जानी चाहिए। अगर पंत का घर उत्तराखंड है तो उन्हें अपने घर लौटने के लिए मदद क्यों मांगनी पड़ी? और अगर मुख्यमंत्री उनकी मदद करते हैं, तो क्या उसी प्रक्रिया को इतना सरल बनाया जा सकता है कि अगली बार किसी दूसरे प्रवासी को मुख्यमंत्री को टैग न करना पड़े? क्योंकि उत्तराखंड को सिर्फ ऋषभ पंत की वापसी की खबर नहीं चाहिए। उत्तराखंड को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें हर ऋषभ पंत अपने घर लौट सके। रात के 12 बजकर 46 मिनट पर लिखा गया एक सोशल मीडिया पोस्ट सुबह की खबर बन गया। लेकिन असली खबर शायद वह पोस्ट नहीं है। असली खबर वह सवाल है, जो पोस्ट के पीछे खड़ा हैकृअपने पहाड़ लौटने की इच्छा रखने वाले आदमी के रास्ते में आखिर कौन खड़ा है? और अगर रास्ते में व्यवस्था खड़ी है, तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? मुख्यमंत्री की, सरकार की, प्रशासन की और शायद उन सभी की, जो वर्षों से कहते आए हैंकृ पहाड़ वापस आओ। अब सवाल यह है कि जब कोई वापस आना चाहता है, तो क्या पहाड़ और उसकी व्यवस्था उसके लिए दरवाजा खोलती है? या फिर दरवाजे तक पहुंचने के लिए भी किसी ऋषभ पंत का होना जरूरी है?

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