शनिवार, 22 अगस्त 2026
बेटी का न्याय बनाम ‘सियासी जंग’
अंकिता भंडारी केस में आखिर कब तक चलेगी बयानबाजी
सीबीआई जांच पर खिंची तलवारों के बीच सवाल दरकिनार
अंकिता की आत्मा को न्याय चाहिए, राजनीति की रोटियां नहीं
प्रकरण पर सियासत तेज,जांच अदालत में या बयानों के मंच पर
देहरादून। अंकिता प्रकरण उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो एक बेटी के परिवार से लेकर पूरे समाज तक फैला हुआ है। ऐसे मामले में सबसे जरूरी चीज हैकृन्याय। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न्याय की इस लंबी यात्रा के बीच राजनीति लगातार अपना रास्ता खोज लेती है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच को लेकर सरकार और जांच एजेंसी की भूमिका सवालों के घेरे में है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने में जुटी है और केंद्रीय जांच ब्यूरो तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार जांच कर रही है। यहीं से असली सवाल पैदा होता हैकृकि क्या किसी जांच की दिशा बयानबाजी से तय होगी या सबूतों से? किसी भी आपराधिक मामले में अदालत के सामने आरोप नहीं, साक्ष्य टिकते हैं। जांच एजेंसी का काम प्रेस कांफ्रेंस में फैसला सुनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों, बयानों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की पड़ताल करना है। सीबीआई हो या कोई दूसरी जांच एजेंसी, उसकी जांच का अंतिम मूल्यांकन अदालत में होना है। लेकिन राजनीति को अदालत का इंतजार कम ही पसंद आता है।
एक तरफ कांग्रेस सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ भाजपा उन सवालों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर रही है। टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता जा रहा है। मगर इस शोर में सबसे महत्वपूर्ण आवाज कहीं पीछे छूटने का खतरा हैकृअंकिता के परिवार की न्याय की आवाज। कांग्रेस यदि सीबीआई जांच पर सवाल उठाती है तो उसे सिर्फ राजनीतिक बयान देने के बजाय ठोस तथ्यों के साथ अपनी आपत्तियां सामने रखनी चाहिए। कौन-सा साक्ष्य नजरअंदाज हुआ? किस बिंदु पर जांच में कमी है? किस तथ्य की अनदेखी की गई? जनता को यह बताया जाना चाहिए। उधर सरकार और भाजपा के पास भी केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी है। जनता का भरोसा सिर्फ इस वाक्य से नहीं बनता। जांच की प्रक्रिया में पारदर्शिता, अदालत में मजबूत पैरवी और पीड़ित परिवार को समय पर न्यायकृयही भरोसा पैदा करते हैं। क्योंकि जनता अब राजनीतिक दावों से आगे देखना चाहती है।
अंकिता प्रकरण में वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार के लिए हर नया बयान शायद पुराने जख्म को फिर खोलता है। इसलिए राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि किसी बेटी की त्रासदी को चुनावी पोस्टर, प्रेस नोट और राजनीतिक भाषण का विषय बनाने से न्याय नहीं मिलता और यहां एक असुविधाजनक सवाल दोनों पक्षों से है। अगर जांच सही है तो अदालत में साक्ष्य बोलने दीजिए। अगर जांच में कमी है तो ठोस तथ्य सामने रखिए। सिर्फ राजनीति हो रही है कहकर हर सवाल को खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक जवाब नहीं है। और हर जांच को साजिश बताकर संदेह पैदा करना भी न्याय प्रक्रिया को मजबूत नहीं करता।
उत्तराखंड के लोगों ने इस प्रकरण में बहुत कुछ देखा हैकृआक्रोश, आंदोलन, राजनीतिक आरोप, वादे और फिर लंबी कानूनी प्रक्रिया। अब जनता को बहस नहीं, परिणाम चाहिए। राजनीति अपनी जगह है। जांच अपनी जगह। अदालत अपनी जगह। अंकिता के मामले में सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, साक्ष्यों के आधार पर हो और अदालत के सामने पूरा सच पहुंचे। दोषी कौन है, इसका फैसला राजनीतिक दलों के मंच से नहीं, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया से होना चाहिए। क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं रहेगा कि किस पार्टी ने कितनी प्रेस कांफ्रेंस कीं। सवाल यह रहेगा कि अंकिता को न्याय मिला या नहीं? और इस सवाल का जवाब किसी पार्टी के प्रवक्ता के पास नहीं, न्याय की प्रक्रिया के पास होना चाहिए।
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