शनिवार, 22 अगस्त 2026
वोटर लिस्ट पर ‘सियासी जंग’
ड्रामेबाजी और घुसपैठिए के बयानों में उलझा लोकतंत्र का असली सवाल
मतदाता सूची के बहाने कांग्रेस की घेराबंदी और भाजपा का काउंटर अटैक
अगर सूची में खोट नहीं तो इतने सवाल क्यों और खोट है तो सुधार कब होगा
विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस आक्रामक, भाजपा ने साधा निशाना
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर लगातार सवाल उठा रही है, दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस की इस मुहिम को ड्रामेबाजी बताकर उसके जमीनी संगठन पर सवाल खड़े कर रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस जमीनी राजनीति में कमजोर हो चुकी है और अब मतदाता सूची के मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यह नहीं कि कौन किसे ड्रामेबाज कह रहा है। असली सवाल यह है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक कौन करेगा और अगर गड़बड़ी नहीं है तो इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा कह रही है कि उत्तराखंड की सरकार यहां की जनता चुनेगी, कोई घुसपैठिया नहीं। राजनीतिक संदेश साफ हैकृमतदाता सूची की शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान के सवाल से जोड़कर कांग्रेस पर दबाव बनाना। भाजपा के लिए यह मुद्दा चुनावी रणनीति का हिस्सा भी है और अपने समर्थक मतदाताओं को सक्रिय करने का माध्यम भी।
कांग्रेस के सामने चुनौती दूसरी है। सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस, बयान और आरोपों से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। मतदाता से संपर्क, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और कार्यकर्ताओं की मौजूदगीकृयही जमीनी राजनीति की असली परीक्षा है। यदि कांग्रेस एसआईआर को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधि उतारने होंगे, प्रभावित मतदाताओं की सूची तैयार करनी होगी और तथ्य के साथ चुनाव आयोग के सामने आपत्तियां रखनी होंगी। वरना भाजपा का ड्रामेबाजी वाला आरोप कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बन सकता है। लेकिन भाजपा को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची कोई राजनीतिक प्रचार का दस्तावेज नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी वास्तविक भारतीय मतदाता का नाम केवल प्रक्रिया की गड़बड़ी के कारण छूटता है तो उसका नुकसान किसी पार्टी को नहीं, लोकतंत्र को होता है। इसलिए एसआईआर को लेकर उठ रहे हर गंभीर सवाल का जवाब तथ्यों से देना जरूरी है।
घुसपैठिया नहीं, जनता चुनेगी सरकारकृयह राजनीतिक नारा सुनने में प्रभावी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता की पहचान से आगे उसकी स्वतंत्र पसंद में है। मतदाता कौन है, यह कानून और चुनावी प्रक्रिया तय करेगी और किसे वोट देना है, यह जनता तय करेगी और यहीं 2027 की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। भाजपा अपने संगठन और बूथ नेटवर्क के भरोसे कांग्रेस पर बढ़त का दावा कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल, बेरोजगारी, भर्ती विवाद, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाने की कोशिश में है। लेकिन इन मुद्दों को वोट में बदलने के लिए कांग्रेस को बयानबाजी से कहीं आगे जाना होगा।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा नहीं, उसकी अपनी जमीनी निष्क्रियता है। यदि पार्टी के नेता राजधानी में एसआईआर पर रोज बयान देते रहें और गांव-कस्बे के बूथ पर कार्यकर्ता दिखाई न दे, तो राजनीति प्रेस नोट में जरूर जिंदा रह सकती है, चुनाव में नहीं। दूसरी ओर भाजपा यदि संगठन की ताकत के भरोसे यह मान ले कि चुनाव पहले ही जीत लिया गया है तो वह भी गलती करेगी। उत्तराखंड का मतदाता कई बार सत्ता को चौंकाने की क्षमता रखता है। पहाड़ के गांव से लेकर मैदानी शहर तक मतदाता अपने मुद्दों पर फैसला करता है और चुनाव के दिन राजनीतिक समीकरणों की सारी गणित बदल सकता है। इसलिए एसआईआर का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं होना चाहिए। यह सवाल होना चाहिए कि किसका नाम मतदाता सूची में है, किसका नाम नहीं है और क्यों नहीं है।
चुनावी शोर में यह बुनियादी सवाल दबना नहीं चाहिए। क्योंकि सरकार न भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट चुनेगा, न कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस। सरकार वही चुनेगा जिसके सामने आखिर में मतदाता अपना वोट डालेगा और उस मतदाता को घुसपैठिया कहकर नहीं, उसके अधिकार और भरोसे के साथ देखना होगा। 2027 की असली लड़ाई अभी शुरू हुई है। एसआईआर उसका एक अध्याय है। फैसला पूरी किताब पर होगा।
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