सोमवार, 17 अगस्त 2026
कांग्रेस हाईकमान का उत्तराखंड पर फोकस
राहुल गांधी के दौरे और मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद पार्टी ने राज्य में चुनावी गतिविधियां तेज की
कांग्रेस उत्तराखंड को केवल राज्य इकाई न मानकर सत्ता में वापसी का मुख्य अवसर देख रही
कांग्रेस को सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के साथ-साथ करना होगा बूथ संगठन को भी मजबूत
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश की सियासत पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय नेतृत्व के नेताओं की सक्रियता, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी तैयारियों ने संकेत दिया है कि कांग्रेस अब उत्तराखंड को केवल एक राज्य इकाई के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की अहम राजनीतिक संभावना के तौर पर देख रही है। जून में राहुल गांधी के दौरे और उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के बाद पार्टी की चुनावी गतिविधियों में तेजी आई है। कांग्रेस के लिए उत्तराखंड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद अब सत्ता की हैट्रिक की कोशिश में है। ऐसे में कांग्रेस के सामने सिर्फ सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे अपने संगठन को बूथ तक मजबूत करके चुनावी मुकाबले को बराबरी पर लाना होगा।
उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से संगठन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में देरी भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय रही। जून में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक हाईकमान प्रदेश में छोटी लेकिन सक्रिय टीम बनाकर नेताओं की जिम्मेदारियां तय करने पर जोर दे रहा था। अब राष्ट्रीय नेतृत्व का फोकस केवल संगठन घोषित करने तक सीमित नहीं दिख रहा। विधानसभा स्तर पर आंतरिक सर्वे के जरिए पार्टी यह जानने की कोशिश कर रही है कि किस सीट पर संगठन की स्थिति क्या है, कौन से नेता प्रभावी हैं और जनता के बीच कौन से मुद्दे चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण है। कांग्रेस यदि इस बार पुराने राजनीतिक समीकरणों के भरोसे चुनाव लड़ने के बजाय सीटवार रणनीति तैयार करती है तो मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है।
उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह भाजपा विरोध को वोट में कैसे बदले। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, महंगाई और पहाड़ की बुनियादी समस्याएं कांग्रेस के लिए मुद्दे हैं। लेकिन मुद्दा उठाना और उसे चुनावी संगठन के जरिए मतदाता तक पहुंचाना दो अलग बातें हैं। कांग्रेस को यह भी तय करना होगा कि उसका चुनावी नैरेटिव क्या होगा। क्या पार्टी केवल सरकार की कमियां गिनाएगी या उत्तराखंड के अगले पांच वर्षों के लिए कोई स्पष्ट राजनीतिक और विकास माडल भी सामने रखेगी? यही वह सवाल है जिसका जवाब हाईकमान को प्रदेश नेतृत्व से चाहिए।
कांग्रेस के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न नेतृत्व का है। पार्टी में कई वरिष्ठ नेता हैं और हर नेता का अपना क्षेत्रीय प्रभाव है। लेकिन चुनावी राजनीति में सामूहिक नेतृत्व और मुख्यमंत्री चेहरे की बहस के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। हाईकमान के सामने चुनौती यह भी है कि टिकट वितरण से पहले नेताओं के बीच खींचतान को कैसे रोका जाए। एक परिवार, एक टिकट जैसे मुद्दे भी पार्टी के भीतर चर्चा में रहे हैं। यदि टिकट को लेकर अंतिम समय तक असमंजस रहा तो संगठनात्मक तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसलिए हाईकमान शायद इस बार पहले से फीडबैक लेकर सीटों और संभावित उम्मीदवारों पर काम करना चाहता है।
कांग्रेस पर दबाव इसलिए भी है क्योंकि भाजपा ने भी 2027 के लिए संगठन को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। हाल में भाजपा ने अपनी प्रदेश कार्यकारिणी का विस्तार किया है और संगठनात्मक स्तर पर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए समय कम है। चुनाव चाहे निर्धारित समय पर हों या समय से पहले होने की अटकलें राजनीतिक माहौल में बनी रहें, विपक्षी दल को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना होगा। फिलहाल चुनाव समय से पहले कराने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है।
उत्तराखंड की राजनीति को केवल देहरादून या मैदानी क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरणों से नहीं समझा जा सकता। पहाड़ की नाराजगी, मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षाएं, युवाओं का रोजगार संकट, पलायन और महिलाओं की राजनीतिक भूमिकाकृये सभी चुनावी परिणाम तय करने वाले मुद्दे हो सकते हैं। कांग्रेस यदि हाईकमान के फोकस को जमीन तक ले जाना चाहती है तो उसे हर विधानसभा क्षेत्र की अलग राजनीतिक कहानी समझनी होगी। पहाड़ की सीट पर पहाड़ का मुद्दा और मैदानी सीट पर स्थानीय मुद्देकृएक ही नारे से पूरा उत्तराखंड नहीं जीता जा सकता।
राष्ट्रीय नेतृत्व का उत्तराखंड की ओर देखना कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन हाईकमान की सक्रियता अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। असल परीक्षा प्रदेश कांग्रेस की है। क्या वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर एकजुट होंगे? क्या संगठन बूथ स्तर तक पहुंचेगा? क्या टिकट वितरण में सर्वे और जमीनी फीडबैक को महत्व मिलेगा? क्या कांग्रेस युवाओं और महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक एजेंडा तैयार करेगी? और सबसे अहमकृक्या पार्टी भाजपा के खिलाफ नाराजगी को अपने पक्ष में मतदान में बदल पाएगी? उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए 2027 केवल सत्ता में वापसी का चुनाव नहीं है। यह संगठन की विश्वसनीयता और राजनीतिक अस्तित्व की भी बड़ी परीक्षा है। हाईकमान ने अगर उत्तराखंड पर फोकस बढ़ाया है तो अब प्रदेश कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि दिल्ली से आया फोकस पहाड़ के गांवों तक पहुंच भी रहा है। क्योंकि चुनाव हाईकमान की बैठकों में नहीं, आखिरकार बूथ और मतदाता के बीच जीता जाता है।
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