मंगलवार, 4 अगस्त 2026
मतदाता सूची पुनरीक्षण पर ‘संग्राम’
2027 चुनाव से पहले सड़कों पर उतरी कांग्रेस
उत्तराखंड की सियासत में कांग्रेस का हल्लाबोल
मतदाता सूची के बहाने चुनावी रण का आगाज
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्माने लगा है। इस बार मुद्दा बना है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण। कांग्रेस ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए राज्यभर में विरोध प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। पार्टी नेताओं का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने की आशंका है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी मुद्दे को लेकर प्रदेश कांग्रेस ने जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किए, चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपे और सरकार के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की त्रुटि लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकती है और इसलिए प्रत्येक पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। उनका आरोप है कि यदि प्रक्रिया में लापरवाही हुई तो हजारों मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। पार्टी ने मांग की है कि प्रत्येक आपत्ति और दावे का निष्पक्ष तरीके से निस्तारण किया जाए तथा पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक निगरानी में हो। प्रदेश कांग्रेस का कहना है कि वह केवल राजनीतिक विरोध नहीं कर रही, बल्कि मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठा रही है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय रहने और मतदाता सूची का सत्यापन कराने के निर्देश भी दिए हैं।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण चुनाव आयोग की नियमित और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस बिना ठोस प्रमाण के जनता में भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है। भाजपा का दावा है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम छूटता है, तो उसके लिए चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा और आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था पहले से मौजूद है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर का मुद्दा केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सभी दल अपने-अपने समर्थक वर्ग को सक्रिय करने में जुटे हैं। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार का मुद्दा बना रही है, जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बताकर विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रही है। राज्य में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों के बीच अब मतदाता सूची का सवाल भी चुनावी बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। आयोग के सामने चुनौती है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध ढंग से पूरी हो, ताकि किसी भी प्रकार की आशंका या विवाद की गुंजाइश न रहे। यदि किसी मतदाता का नाम छूटता है, तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत समय पर सुधार का अवसर मिल सके।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड में चुनावी बिगुल अभी औपचारिक रूप से नहीं बजा है, लेकिन एसआईआर को लेकर शुरू हुआ विवाद यह संकेत जरूर दे रहा है कि आने वाले महीनों में राजनीतिक दल जनता से जुड़े हर मुद्दे को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाएंगे। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर अपनी सक्रियता का संदेश देने की कोशिश की है, जबकि भाजपा चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा जताते हुए विपक्ष के आरोपों को निराधार बता रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि एसआईआर का यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या आने वाले विधानसभा चुनावों में यह वास्तव में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है।
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