मंगलवार, 4 अगस्त 2026

पहाड़ की संस्कृति पर ‘डिजिटल’ प्रहार

अस्तित्व के संकट से जूझती देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर झुमेलो पहाड़ में दुख-सुख व सांस्कृतिक चेतना का था कभी जीवंत माध्यम मोबाइल रील्स व आधुनिकता के बीच गुम हो रही हैं लोक परंपराएं सिर्फ एक नृत्य नहीं पहाड़ की सामूहिक आत्मा का उत्सव था झुमेलो देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय की बर्फीली चोटियों, देवस्थलों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं है। इस प्रदेश की असली ताकत उसकी लोक संस्कृति, लोकगीतों और पारंपरिक लोककलाओं में बसती है। इन्हीं अमूल्य धरोहरों में एक है झुमेलोकृएक ऐसा लोकनृत्य जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक जीवन, सामूहिकता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। आज जब आधुनिकता और डिजिटल संस्कृति गांवों तक पहुंच चुकी है, तब झुमेलो जैसी लोककलाएं अपने अस्तित्व की चुनौती से जूझ रही हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाली पीढ़ियां केवल मोबाइल स्क्रीन पर रील्स देखेंगी, या फिर ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ेंगी? झुमेलो उत्तराखंड, विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र का लोकप्रिय पारंपरिक लोकनृत्य और लोकगायन है। इसका नाम ही झूमने से निकला माना जाता है। इसमें महिलाएं और पुरुष समूह बनाकर गोलाकार या अर्धवृत्त में खड़े होकर तालबद्ध कदमों और मधुर गीतों के साथ नृत्य करते हैं। इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहजता है। इसमें मंच, चमकदार रोशनी या आधुनिक साज-सज्जा की जरूरत नहीं होती। गांव का चौक, खेत की मेड़, मंदिर का आंगन या किसी मेले का खुला मैदान ही इसका सबसे बड़ा मंच बन जाता है। झुमेलो की आत्मा उसके लोकवाद्य हैं। ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, हुड़का और बांसुरी की मधुर ध्वनि पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है। जैसे ही ढोल की पहली थाप पड़ती है, लोग स्वतः ही नृत्य की लय में बंध जाते हैं। झुमेलो के गीतों में प्रेम, प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, देवी-देवताओं की महिमा, खेती-बाड़ी, सामाजिक रिश्ते और पहाड़ के संघर्ष की झलक मिलती है। यह केवल संगीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक स्मृतियों का मौखिक इतिहास भी है। पहाड़ का जीवन हमेशा सामूहिक रहा है। खेती हो, शादी-ब्याह हो, मेले-त्योहार हों या किसी देवता का उत्सवकृहर अवसर पर पूरा गांव एक परिवार की तरह शामिल होता है। झुमेलो इसी सामूहिक जीवन का सांस्कृतिक विस्तार है। यह नृत्य किसी एक कलाकार का प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता का प्रतीक होता है। यहां दर्शक और कलाकार के बीच कोई दीवार नहीं होती। हर व्यक्ति इस उत्सव का हिस्सा बन जाता है। झुमेलो केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसके गीतों में सामाजिक संदेश भी छिपे होते हैं। कहीं बेटी के सम्मान की बात होती है, कहीं प्रकृति संरक्षण का संदेश, तो कहीं मेहनत और ईमानदारी का महत्व। पहाड़ की लोककलाएं हमेशा समाज को जोड़ने का माध्यम रही हैं। उन्होंने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के लोगों को संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारियों का पाठ पढ़ाया। समय के साथ गांवों से पलायन बढ़ा। रोजगार और शिक्षा के लिए युवा शहरों की ओर चले गए। गांव खाली होने लगे और उनके साथ लोककलाओं की जीवंत परंपरा भी कमजोर पड़ने लगी। आज कई गांव ऐसे हैं जहां पहले हर त्योहार पर झुमेलो की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब वहां सन्नाटा पसरा रहता है। विवाह समारोहों में लोकवाद्यों की जगह डीजे ने ले ली है। पारंपरिक गीतों की जगह फिल्मी संगीत बजने लगा है। यह बदलाव केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के क्षरण का संकेत भी है। सकारात्मक बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के कई युवा कलाकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और सोशल मीडिया मंच झुमेलो सहित अन्य लोककलाओं को नई पहचान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। यूट्यूब, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों के वीडियो लाखों लोग देख रहे हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सांस्कृतिक महोत्सवों में भी झुमेलो को मंच मिल रहा है। यदि इस प्रयास को सरकारी संरक्षण और समाज का सहयोग मिले, तो यह परंपरा नई पीढ़ी के बीच और मजबूत हो सकती है। उत्तराखंड में धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं। यदि स्थानीय मेलों, होम-स्टे, पर्यटन उत्सवों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में झुमेलो को नियमित स्थान मिले, तो यह न केवल संस्कृति को जीवित रखेगा बल्कि स्थानीय कलाकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा। लोककला केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक ताकत भी बन सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि झुमेलो जैसी लोककलाओं को बचाने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। परिवार, विद्यालय, ग्राम सभाएं, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। स्कूलों में लोकनृत्य और लोकसंगीत को सह-पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। ग्राम स्तर पर सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन हो। वरिष्ठ लोक कलाकारों का सम्मान और उनके अनुभव का दस्तावेजीकरण किया जाए। डिजिटल माध्यमों पर लोककला का संग्रह और प्रचार-प्रसार बढ़ाया जाए। युवा कलाकारों को आर्थिक और संस्थागत सहयोग दिया जाए। झुमेलो केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा की धड़कन है। यह उस समाज की कहानी कहता है जिसने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी गीत, संगीत और सामूहिकता को कभी नहीं छोड़ा। आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की दौड़ में हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को न भूलें। क्योंकि जिस समाज की लोककलाएं जीवित रहती हैं, उसकी पहचान भी जीवित रहती है। ढोल-दमाऊ की हर थाप और झुमेलो का हर कदम हमें यही याद दिलाता है कि आधुनिकता का स्वागत करें, लेकिन अपनी संस्कृति की कीमत पर नहीं। यही उत्तराखंड की असली पहचान है, और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत।

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