गुरुवार, 13 अगस्त 2026
चेहरे बदले, सरकारें बदलीं, सवाल वहीं
उत्तराखंड के तीखे सवाल
प्रदेश में पलायन रोकने के लिए योजनाएं व समितियां भी बनीं
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अभाव में पहाड़ के गांव खाली
बच्चों की पढ़ाई व इलाज के लिए अपने ही घर-आंगन को छोड़ा
सत्ता के दावे और पहाड़ की जमीन के बीच साफ दिखता फासला
देहरादून। उत्तराखंड में सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, नारे बदलते रहे। कभी विकास का नारा आया, कभी पलायन रोकने का संकल्प, कभी रोजगार की गारंटी, कभी गांवों को फिर से आबाद करने का दावा। लेकिन पहाड़ का आदमी आज भी कुछ पुराने सवाल लेकर खड़ा है। इन सवालों का कोई पार्टी रंग नहीं है। न यह भाजपा के हैं, न कांग्रेस के। यह पहाड़ के सवाल हैं और शायद इसलिए सबसे ज्यादा असहज भी करते हैं। हर सरकार पलायन रोकने की बात करती है। योजनाएं बनती हैं, समितियां बनती हैं, आंकड़े जारी होते हैं। लेकिन पहाड़ का सवाल बहुत सीधा हैकृअगर गांव में रोजगार, इलाज, शिक्षा और बाजार मिल जाए तो कोई अपना घर छोड़कर क्यों जाएगा? पलायन को रोकने के लिए पहाड़ के आदमी को भाषण नहीं, स्थानीय अर्थव्यवस्था चाहिए। खेती से आमदनी चाहिए। बागवानी चाहिए। पर्यटन का लाभ गांव तक पहुंचना चाहिए। छोटे उद्योग चाहिए और सबसे जरूरीकृबच्चों की पढ़ाई और परिवार के इलाज के लिए पहाड़ छोड़ने की मजबूरी खत्म होनी चाहिए।
प्रदेश में सड़क को विकास का सबसे बड़ा प्रतीक मान लिया गया है। सड़क बनना जरूरी है, लेकिन सड़क से आगे भी जिंदगी है। किसी गांव से एंबुलेंस आने में घंटों लगते हैं तो सवाल सड़क का ही नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था का भी है। आज भी पहाड़ में गंभीर मरीज को डोली, कुर्सी या किसी दूसरे अस्थायी साधन से सड़क तक पहुंचाने की तस्वीरें सामने आती हैं। सरकारें मेडिकल कालेजों और अस्पतालों की घोषणाएं करती हैं। लेकिन गांव पूछता हैकृकि डाक्टर कब मिलेगा? विशेषज्ञ कब मिलेगा? दवा कब मिलेगी? और सबसे बड़ा सवालकृक्या बीमारी का इलाज कराने के लिए पहाड़ छोड़ना जरूरी रहेगा?
उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ परीक्षा नहीं हैं। यह कई परिवारों की उम्मीद हैं। लेकिन जब भर्ती प्रक्रिया सवालों में घिरती है, परीक्षा की तारीख बदलती है, परिणाम अटकता है या पेपर लीक की खबर आती है तो एक छात्र का सिर्फ एक साल नहीं जाता। उसका भरोसा जाता है। सत्ता को यह समझना होगा कि सरकारी भर्ती का कैलेंडर भी सरकार की विश्वसनीयता का कैलेंडर है। विपक्ष सवाल उठाएकृजरूर उठाए। लेकिन विपक्ष को भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह भर्ती प्रक्रिया को कैसे पारदर्शी बनाएगा। सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि सरकार विफल है। जनता पूछेगीकृकि आप क्या करेंगे?
उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन बढ़ रहा है। चारधाम यात्रा प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। लेकिन एक सवाल फिर भी बचता हैकृकि जो लाखों लोग पहाड़ आते हैं, उनके खर्च का कितना हिस्सा स्थानीय गांवों तक पहुंचता है? क्या स्थानीय युवक गाइड बन रहा है? क्या गांव की महिला अपने उत्पाद बेच पा रही है? क्या स्थानीय किसान होटल और बाजार से जुड़ पा रहा है? अगर तीर्थयात्री आते हैं और पैसा कुछ चुनिंदा बाजारों तक सीमित रह जाता है, तो पर्यटन की संख्या बढ़ने के बावजूद पहाड़ की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
बारिश आती है। सड़क टूटती है। पुल बहता है। गांव कट जाता है। फिर राहत पहुंचती है। कुछ दिन खबरें चलती हैं। नेता मौके पर पहुंचते हैं। मुआवजे की घोषणा होती है। फिर कैमरे चले जाते हैं। लेकिन गांव वह वहीं रहता है। उसका टूटा रास्ता वहीं रहता है। उसका बंद स्कूल वहीं रहता है। उसकी मुश्किल वहीं रहती है। इसलिए सवाल सिर्फ राहत का नहीं है। सवाल यह है कि पहाड़ को हर बरसात में आपदा का इंतजार क्यों करना पड़ता है?
उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे से सवाल पूछते हैं। लेकिन अब जनता दोनों से सवाल पूछ रही है। सत्ता सेकृकि आपने पांच साल में क्या बदला? विपक्ष सेकृकि आप सत्ता में आए तो क्या बदलेंगे? सत्ता कहती है विकास हुआ। जनता पूछती हैकृकहां हुआ? विपक्ष कहता है सरकार विफल है। जनता पूछती हैकृकि आपकी वैकल्पिक योजना क्या है? सत्ता उपलब्धियां गिनाती है। विपक्ष आरोप गिनाता है और पहाड़ अपने हिस्से का हिसाब मांगता है।
2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है। जैसे-जैसे चुनावी माहौल बनेगा, पहाड़ फिर नारों से भर जाएगा। कोई रोजगार की बात करेगा। कोई पलायन की। कोई महिला वोट की। कोई युवा की। कोई धार्मिक पर्यटन की। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि राजनीतिक दल इन सवालों को घोषणापत्र से निकालकर नीति में बदलने का रोडमैप देते हैं या नहीं। उत्तराखंड को अब सिर्फ यह नहीं चाहिए कि कौन जीतेगा। उत्तराखंड यह जानना चाहता हैकृकि जीतने के बाद पहाड़ के लिए करेगा क्या? क्योंकि पहाड़ ने बहुत भाषण सुन लिए हैं। बहुत शिलान्यास देख लिए हैं। बहुत घोषणाएं सुन ली हैं। अब उसे परिणाम चाहिए। उसे ऐसा गांव चाहिए जहां स्कूल बंद न हो। ऐसा अस्पताल चाहिए जहां डाक्टर मिले। ऐसी सड़क चाहिए जो बरसात में गायब न हो। ऐसी भर्ती व्यवस्था चाहिए, जिसमें युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित न रहे और ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें पहाड़ का बच्चा रोजगार के लिए पहाड़ छोड़ने को मजबूर न हो।
उत्तराखंड के सवाल कठिन नहीं हैं। वह इतने सरल हैं कि उनका जवाब देना मुश्किल हो जाता है। रोटी कहां है? रोजगार कहां है? अस्पताल कहां है? स्कूल कहां है? गांव में आदमी क्यों नहीं है? सत्ता के पास इन सवालों के जवाब होने चाहिए। विपक्ष के पास भी। क्योंकि चुनाव में जनता सिर्फ सरकार नहीं चुनती। वह अपने सवालों का भविष्य चुनती है और इस बार पहाड़ शायद नारे कम सुनेगा। सवाल ज्यादा पूछेगा।
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