बुधवार, 19 अगस्त 2026
भाजपा ने सजाई ‘हैट्रिक’ की फील्डिंग
2027 में चुनावी हैट्रिक का संकल्प, भाजपा ने कसी कमर
गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसद-विधायकों को टास्क
भाजपा ने अपनी संगठनात्मक रणनीति को दी अंतिम धार
बूथ से लेकर विधानसभा तक सक्रियता बढ़ाने की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी उलटी गिनती के बीच भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। गढ़वाल संभाग की संगठनात्मक बैठक में सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों ने आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन किया। बैठक का केंद्रीय संदेश साफ रहाकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर चुनावी हैट्रिक लगानी है। भाजपा के लिए यह बैठक महज संगठनात्मक समीक्षा नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी की जमीन पर अंतिम रूपरेखा तय करने की कवायद के तौर पर देखी जा रही है। पार्टी अब सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ बूथ स्तर पर संगठन को और मजबूत करने, कमजोर क्षेत्रों को चिन्हित करने तथा कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने पर जोर दे रही है।
गढ़वाल संभाग की बैठक में सांसदों और विधायकों की मौजूदगी ने इसे और महत्वपूर्ण बना दिया। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि जनप्रतिनिधियों और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए। चुनावी साल में यह तालमेल इसलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा की चुनावी रणनीति केवल प्रत्याशियों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक फैले संगठन पर टिकी होती है। सांसदों और विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन के साथ लगातार संवाद बनाए रखने, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दिया गया। साथ ही ऐसे क्षेत्रों की पहचान पर भी ध्यान है जहां पार्टी को चुनावी दृष्टि से अतिरिक्त मेहनत की जरूरत पड़ सकती है।
भाजपा 2027 में सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है। ऐसे में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना भाजपा के लिए केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि राज्य की स्थापित राजनीतिक प्रवृत्ति को बदलने की चुनौती भी है। भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। अब पार्टी की नजर तीसरी जीत पर है। इसके लिए संगठन को सरकार के कामकाज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक लोकप्रियता के साथ स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़ को चुनावी ताकत में बदलना होगा। भाजपा की रणनीति में एक तरफ सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी है तो दूसरी तरफ संगठन को विपक्ष के हमलों का जवाब देने के लिए तैयार किया जा रहा है। सड़क, चारधाम यात्रा, पर्यटन, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश, समान नागरिक संहिता और राज्य से जुड़े विकास कार्यों को लेकर सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने की कोशिश होगी। इसके साथ ही कांग्रेस के संभावित चुनावी मुद्दों और सरकार विरोधी माहौल को लेकर भी पार्टी संगठन को सक्रिय किया जा रहा है। लेकिन भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार की उपलब्धियों का संदेश बूथ तक कितनी मजबूती से पहुंचता है।
2027 के चुनाव में भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर बूथ और कमजोर विधानसभा क्षेत्रों की पहचान हो सकता है, जिन बूथों पर पिछले चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, वहां संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की योजना पर काम किया जा रहा है। पार्टी के लिए बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुख से लेकर मंडल और विधानसभा स्तर तक जिम्मेदारियों को सक्रिय रखना महत्वपूर्ण होगा। यही भाजपा का वह संगठनात्मक माडल है जिसने उसे लगातार चुनावी सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाजपा के चुनावी मोड में आने के साथ कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। विपक्ष पहले ही सरकार को महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है।
ऐसे में भाजपा की रणनीति केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने तक सीमित नहीं रहने वाली। पार्टी को विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर नाराजगी और असंतोष को भी संभालना होगा। खासकर टिकट के दावेदारों और मौजूदा विधायकों के बीच तालमेल चुनाव से पहले पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। संगठन की बैठकों के जरिए इसी तरह के संभावित अंतर्विरोधों को समय रहते नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
उत्तराखंड का अगला विधानसभा चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच चेहरे और मुद्दों की लड़ाई नहीं होगा। यह दोनों दलों के संगठनात्मक नेटवर्क की भी परीक्षा होगी। भाजपा के पास मजबूत कैडर और बूथ नेटवर्क की ताकत है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक समूहों की सक्रियता भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकती है। ऐसे में गढ़वाल संभाग की बैठक से भाजपा ने एक संदेश जरूर दिया हैकृ2027 का चुनाव अभी दूर नहीं है और पार्टी अब चुनावी तैयारी को टालने के मूड में नहीं है। अब असली परीक्षा बैठक में बने संकल्प को जमीन पर उतारने की है। सांसद-विधायक से लेकर मंडल अध्यक्ष और बूथ कार्यकर्ता तक यदि एक ही चुनावी रणनीति पर सक्रिय हो जाते हैं तो भाजपा की हैट्रिक की राह मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि स्थानीय नाराजगी, टिकट की खींचतान और सरकार विरोधी मुद्दे संगठन की ताकत पर भारी पड़े, तो यही चुनाव भाजपा के लिए सबसे कठिन परीक्षा भी बन सकता है।
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