रविवार, 16 अगस्त 2026

‘जंदरू’ मशीनों के शोर सेे ‘खामोश’

आधुनिकता की भेंट चढ़ी पर्वतीय जीवन-शैली व अपनों का साथ पहाड़ में सूरज से पहले जागता था पहाड़ का स्वाभिमान और श्रम चक्की के पत्थरों के साथ पिस गई गाँव की सदियों पुरानी परंपराएँ पहाड़ के बुजुर्गों के दिलों में आज भी जीवंत है जंदरू का वह संगीत देहरादून। जंदरू सिर्फ अनाज पीसने की मशीन नहीं था। यह पहाड़ के घर-आंगन की वह आवाज थी, जिसमें मेहनत भी थी, अपनापन भी और सामूहिक जीवन की धड़कन भी। आज मशीनों ने काम आसान कर दिया है, लेकिन जंदरू की घरघराहट के साथ पहाड़ की एक पूरी जीवन-शैली भी धीरे-धीरे खामोश हो रही है। पहाड़ की सुबह कभी सिर्फ सूरज की पहली किरण से नहीं होती थी। वह शुरू होती थी आंगन में बंधी गाय की घंटी से, चूल्हे में जलती लकड़ी की महक से और कहीं दूर से आती जंदरू की घर्र-घर्र आवाज से। किसी घर में गेहूं पिस रहा है, कहीं मंडुवा, कहीं झंगोरा। महिलाएं अपने रोजमर्रा के काम में जुटी हैं और जंदरू अपनी लय में घूमता जा रहा है। यह दृश्य आज भले ही पहाड़ के गांवों में कम दिखाई देता हो, लेकिन बुजुर्गों की स्मृतियों में जंदरू आज भी उसी तरह जिंदा है। जंदरू यानी हाथ से या पारंपरिक तरीके से अनाज पीसने का वह साधन, जिसने पहाड़ के परिवारों को पीढ़ियों तक आत्मनिर्भर बनाए रखा। इसमें सिर्फ अनाज नहीं पिसता था, रिश्ते भी जुड़ते थे। पहाड़ के पुराने गांवों में जीवन सामूहिक था। किसी के घर जंदरू चल रहा है तो पड़ोस की महिलाएं भी वहां पहुंच जाती थीं। काम के साथ बातचीत होती, सुख-दुख बांटे जाते और गांव की छोटी-बड़ी खबरें भी वहीं मिल जाती थीं। किसी के घर शादी है तो चर्चा जंदरू के पास। किसी के घर बच्चा हुआ तो खबर जंदरू तक। खेत में फसल कैसी हुई, किसके बेटे की नौकरी लगी, किसकी बेटी की शादी तय हुईकृगांव की अपनी छोटी-सी न्यूज एजेंसी भी जैसे यही हुआ करती थी। आज सोशल मीडिया पर सेकंडों में खबर फैल जाती है, लेकिन उस दौर की खबरों में एक चीज ज्यादा थीकृअपनापन। जंदरू का रिश्ता पहाड़ के पारंपरिक खान-पान से भी गहरा था। मंडुवा, झंगोरा, गेहूं और दूसरे स्थानीय अनाजों को पीसने में इसका इस्तेमाल होता था। आज जब मिलेट्स को लेकर देश-दुनिया में चर्चा हो रही है और पहाड़ी अनाजों को स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में फिर पहचान मिल रही है, तब जंदरू की याद भी लौटती है। कभी यही अनाज पहाड़ के गरीब परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उसकी खाद्य-सुरक्षा का आधार थे। घर का अनाज घर में ही तैयार होता था। खेत से खलिहान और खलिहान से जंदरू तक की यह यात्रा पहाड़ की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का हिस्सा थी। जंदरू चलाना आसान काम नहीं था। इसमें श्रम लगता था। समय लगता था। शरीर की ताकत लगती थी। लेकिन उस मेहनत का अपना संतोष था। आज बटन दबाते ही आटा तैयार हो जाता है। सुविधा बढ़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं। पहाड़ की महिलाओं के लिए मशीनों ने कठिन श्रम को कम किया है। यह बदलाव जरूरी भी था। लेकिन सुविधा की इस दौड़ में हमने कुछ चीजें खो भी दीं। जंदरू की आवाज चली गई और उसके साथ सामूहिक श्रम की संस्कृति भी कमजोर होती चली गई। पहाड़ के कई गांवों में पुराने जंदरू अब घरों के कोनों में पड़े मिल जाते हैं। कहीं उन्हें लकड़ी के सामान की तरह संभालकर रखा गया है तो कहीं वह धीरे-धीरे टूट रहे हैं। नई पीढ़ी के बच्चों के लिए यह सवाल स्वाभाविक हैकृयह क्या है? यही सवाल बताता है कि बदलाव कितना बड़ा है, जिस वस्तु के बिना कभी घर का भोजन पूरा नहीं होता था, वह आज नई पीढ़ी के लिए पहचान से बाहर होती जा रही है। जरूरत इस बात की है कि जंदरू को केवल संग्रहालय की वस्तु बनाकर न रखा जाए। इसे पहाड़ की लोक-संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में दर्ज किया जाए। गांवों में पुराने जंदरू, ओखली, सिलबट्टे, हल और दूसरे पारंपरिक उपकरण सिर्फ लकड़ी-पत्थर के सामान नहीं हैं। इनके साथ कृषि, भोजन, श्रम और सामाजिक जीवन की पूरी कहानी जुड़ी हुई है। अगर आज इन्हें दर्ज नहीं किया गया तो कल इतिहास की किताबों में इनके नाम तो मिल जाएंगे, लेकिन इनके पीछे की जिंदगी नहीं मिलेगी। शायद जंदरू पहले की तरह हर घर में वापस न आए। आधुनिक जीवन में इसकी जरूरत भी पहले जैसी नहीं है। लेकिन पहाड़ के किसी गांव में अगर किसी दिन फिर जंदरू की घर्र-घर्र सुनाई दे, तो समझिए सिर्फ अनाज नहीं पिस रहा है। उस आवाज में पहाड़ अपनी स्मृति पीसकर आटा नहीं बना रहा होगा, बल्कि अपनी जड़ों को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहा होगा। क्योंकि पहाड़ की पहचान सिर्फ उसके पहाड़ों, नदियों और देवस्थलों में नहीं है। उसकी पहचान उन आवाजों में भी है जो कभी गांव की सुबह को जीवंत करती थीं। जंदरू की घरघराहट ऐसी ही एक आवाज हैकृजो अब कम सुनाई देती है, लेकिन पहाड़ की यादों में आज भी लगातार घूम रही है।

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