रविवार, 16 अगस्त 2026

‘खामोशी’ टूटी और ‘सियासत’ गर्माई

अंकिता भंडारी मुद्दे पर कांग्रेस का बड़ा दांव, दिल्ली से देहरादून तक हड़कंप अंकिता के माता-पिता का दर्द थाम कांग्रेस ने खोला सरकार के खिलाफ मोर्चा 2022 से जल रही आग अब 2027 के विधानसभा चुनाव में गरमाएगा यह मुद्दा अंकिता भंडारी के माता-पिता से नेताप्रतिपक्ष राहुल संग 45 मिनट की मुलाकात देहरादून। दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अंकिता भंडारी के माता-पिता से मुलाकात ने उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर उस दर्द को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है, जो 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ। राहुल गांधी ने अंकिता के माता-पिता से करीब 45 मिनट तक अकेले में बातचीत की और उनकी पीड़ा सुनी। मुलाकात के बाद कांग्रेस ने इसे केवल एक परिवार से मुलाकात नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा, न्याय और सरकार की जवाबदेही से जुड़ा सवाल बताया। अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड की राजनीति में पहले से ही संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राहुल गांधी का अंकिता के माता-पिता से सीधे मिलना कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पार्टी इस मुद्दे को पहाड़ की बेटी, महिला सुरक्षा और न्याय के सवाल से जोड़कर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर सकती है। राहुल गांधी ने माता-पिता से अकेले में करीब 45 मिनट बातचीत की। इस मुलाकात का राजनीतिक संदेश इसलिए भी बड़ा है क्योंकि अंकिता भंडारी का मामला उत्तराखंड में सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है। यह महिला सुरक्षा, सत्ता और प्रभावशाली लोगों के दबाव तथा न्याय व्यवस्था को लेकर जनता के बीच उठते सवालों का प्रतीक बन चुका है। कांग्रेस इस मुलाकात को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर आगे बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। पार्टी का प्रयास होगा कि अंकिता के माता-पिता की आवाज को विधानसभा चुनाव की बहस में प्रमुख स्थान मिले और इसे उत्तराखंड की महिलाओं और युवाओं के सवालों से जोड़ा जाए। अंकिता प्रकरण भाजपा के लिए इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि मामले से जुड़े आरोपों और राजनीतिक विवादों ने सरकार को लंबे समय तक विपक्ष के निशाने पर रखा। कांग्रेस अब एक बार फिर सवाल उठा रही है कि क्या अंकिता के परिवार को वह न्याय मिला, जिसकी उम्मीद उसने की थी? राहुल गांधी की मुलाकात के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक तेजी से उभर सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार के खिलाफ केवल एक आरोप का विषय नहीं, बल्कि महिला सम्मान और न्याय की लड़ाई का राजनीतिक नैरेटिव बनाने का अवसर है। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पहले से ही महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। लेकिन अंकिता भंडारी प्रकरण इन सभी मुद्दों के बीच भावनात्मक और राजनीतिक रूप से अलग प्रभाव रखता है। कांग्रेस की कोशिश हो सकती है कि वह इस मामले को उत्तराखंड की बेटी के सवाल के रूप में पेश करे। राहुल गांधी की मुलाकात इसी रणनीति की शुरुआत मानी जा रही है। पार्टी यदि इस मुद्दे को महिला सुरक्षा, रोजगार और पहाड़ की बेटियों के भविष्य से जोड़ने में सफल रहती है तो भाजपा के लिए जवाब देना आसान नहीं होगा। हालांकि भाजपा के सामने भी इसका राजनीतिक जवाब मौजूद है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि अंकिता मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हुई है। इसलिए चुनावी मंच पर कांग्रेस के आरोपों का जवाब भाजपा कानूनी कार्रवाई और सरकार की ओर से उठाए गए कदमों के आधार पर देने की कोशिश करेगी। इस मुलाकात के बाद सवाल कांग्रेस से भी होगा। क्या पार्टी अंकिता के परिवार की पीड़ा को केवल चुनावी मुद्दा बनाएगी या इसे न्याय और महिला सुरक्षा के व्यापक अभियान में बदलेगी? उत्तराखंड की जनता इस फर्क को समझती है। राहुल गांधी की मुलाकात ने फिलहाल भाजपा के सामने एक पुराना लेकिन संवेदनशील सवाल फिर खड़ा कर दिया है। 2027 में मुकाबला सिर्फ सरकार बनाने का नहीं होगा, बल्कि जनता की स्मृतियों और भावनाओं पर भी होगा। अंकिता का नाम उत्तराखंड की राजनीति में फिर सामने है। सवाल यह है कि 2027 के चुनाव में यह नाम सिर्फ भाषणों में गूंजेगा या महिला सुरक्षा और न्याय की राजनीति का स्थायी मुद्दा बनेगा?

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