सोमवार, 24 अगस्त 2026

यूकेडी सियासी जमीन पर ‘री-लांच’

वजूद बचाने को गांव-गांव बिछाया जा रहा यूकेडी का सांगठनिक जाल राज्य बनाने वाला दल अपनी जगह ढूंढ रहाकृगांव-कस्बों पर टिकीं नजरें लगातार हार और बिखराव के बीच नए सिरे से ताकत झोंकने की तैयारी देहरादून। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी चुनावी तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है। लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में अपने लिए मजबूत जमीन तलाश रहे दल के सामने इस बार चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और जनता के बीच अपनी खोई राजनीतिक जगह वापस हासिल करने की भी है। यूकेडी कार्यकर्ताओं को अब गांव, कस्बे और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होने का संदेश दिया जा रहा है। राज्य गठन के आंदोलन से निकला यूकेडी उत्तराखंड की राजनीति में कभी मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले वर्षों में संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व के स्तर पर खींचतान और लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के चलते दल का प्रभाव सीमित हुआ है। अब आगामी विधानसभा चुनाव को दल के लिए राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। यूकेडी की रणनीति में सबसे बड़ा जोर स्थानीय मुद्दों को चुनावी राजनीति के केंद्र में लाने पर है। पहाड़ से पलायन, रोजगार, मूल निवास, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन, गैरसैंण, पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की बदहाल स्थिति और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार जैसे सवालों को लेकर कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाने की तैयारी है। दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस भी लगातार अपना राजनीतिक पक्ष रखती रही हैं। ऐसे में यूकेडी को जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह केवल चुनावी मौसम में क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल उठाने वाला दल नहीं, बल्कि राज्य के हितों के लिए लगातार संघर्ष करने वाला राजनीतिक विकल्प है। यूकेडी के भीतर संगठन को सक्रिय करने को लेकर बैठकों का दौर तेज होने की उम्मीद है। विधानसभा स्तर पर संभावित प्रत्याशियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं की भूमिका तय करने के साथ ही बूथ स्तर पर टीम तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय उससे पहले ही संगठन को मैदान में उतार दिया जाए। कार्यकर्ताओं से कहा जा रहा है कि वह केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रहें, बल्कि जनता के बीच जाकर स्थानीय समस्याओं को उठाएं। इससे पार्टी को दोहरा फायदा मिल सकता हैकृएक तरफ संगठन सक्रिय होगा और दूसरी तरफ संभावित प्रत्याशियों की जमीनी पकड़ का भी आकलन हो सकेगा। उत्तराखंड की राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के बीच असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। यूकेडी इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। दल के लिए चुनौती यह होगी कि वह युवाओं के बीच केवल भावनात्मक मुद्दों के बजाय रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर ठोस रोडमैप भी सामने रखे। युवा मतदाता अब केवल नारे नहीं, बल्कि अवसर और जवाबदेही की राजनीति भी चाहता है। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला रहने की स्थिति में यूकेडी के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा। इसके अलावा अन्य राजनीतिक दल भी क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को लेकर मैदान में सक्रिय हैं। ऐसे में यूकेडी को अपने पुराने आंदोलनकारी तेवर के साथ संगठनात्मक मजबूती और नए राजनीतिक नैरेटिव का संयोजन करना होगा। यूकेडी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि राज्य गठन के आंदोलन से निकली क्षेत्रीय राजनीति उत्तराखंड की नई पीढ़ी के बीच कितनी प्रासंगिक रह गई है। यदि दल अपने पारंपरिक मुद्दों को युवाओं के रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जोड़ने में सफल रहता है और संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा कर पाता है, तो वह चुनावी मुकाबले में अपनी मौजूदगी प्रभावी ढंग से दर्ज करा सकता है। फिलहाल यूकेडी के कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ने लगी है और संकेत साफ हैंकृइस बार चुनावी रण में उतरने से पहले संगठन मैदान तैयार करने की कोशिश में है। अब देखना यह होगा कि यह सक्रियता केवल बैठकों और नारों तक सीमित रहती है या गांव-गांव तक वास्तविक राजनीतिक अभियान में बदलती है।

कोई टिप्पणी नहीं: