मंगलवार, 25 अगस्त 2026
गीत और धुन वही और ‘राजनीति नई’
राष्ट्रगीत पर सियासत
वंदे मातरम् की पंक्तियों पर बंटी राजनीति, देशभक्ति टेस्ट पर संग्राम
भाजपा का वार, विपक्ष का सवालकृकौन देगा राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट
राजनीति में राष्ट्रगीत आया तो बहस फिर शब्दों से निकली नीयत पर
देहरादून। वंदे मातरम् फिर राजनीति के मंच पर है। इस बार भी सवाल गीत की पंक्तियों से ज्यादा इस बात पर है कि कौन कितनी देशभक्ति दिखा रहा है और कौन कितनी कम। भाजपा ने विपक्ष को घेरा है। आरोप लगाया जा रहा है कि विपक्ष राष्ट्रभावना के सवाल पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ विपक्ष कह रहा है कि देशभक्ति को राजनीतिक प्रमाणपत्र में बदलने की कोशिश क्यों की जा रही है? यानी गीत वही है, धुन वही है, लेकिन राजनीति नई है। भारत में राष्ट्रगीत वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा भावनात्मक प्रतीक है। लेकिन चुनावी मौसम आते ही प्रतीकों की राजनीति तेज हो जाती है। फिर यह तय होने लगता है कि कौन कितना राष्ट्रवादी है, किसने कितनी पंक्तियां गाईं और किसने कितनी नहीं गाईं। यहीं से सवाल शुरू होता है। क्या देशभक्ति की माप अब गीत की पंक्तियों से होगी? अगर कोई राजनीतिक दल वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां गाता है तो क्या वह अधिक देशभक्त हो जाता है और कोई दल पूरी तरह नहीं गाता तो उसकी देशभक्ति संदिग्ध हो जाती है? लोकतंत्र में यह तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
भाजपा ने विपक्ष को घेरते हुए सवाल उठाया है। राजनीतिक तौर पर भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि राष्ट्रवाद उसके लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। विपक्ष के लिए मुश्किल यह है कि वह इस बहस में कदम रखता है तो भाजपा के बनाए मैदान पर खेलता है और मैदान से बाहर रहता है तो भाजपा उसे राष्ट्रभावना से दूरी के आरोपों से घेरती है। राजनीति का यही खेल है। एक तरफ रोजगार का सवाल है। दूसरी तरफ भर्ती परीक्षाओं की चिंता है। पहाड़ में सड़कें हैं, अस्पताल हैं, स्कूल हैं। युवाओं के भविष्य का सवाल है। महंगाई है। पलायन है। लेकिन चुनावी राजनीति में इन सवालों का जवाब कठिन है। वंदे मातरम् पर बहस करना आसान है। यह ऐसा मुद्दा है जिसमें एक नारा लगाइए, भीड़ तालियां बजाएगी। सोशल मीडिया पर वीडियो डालिए, समर्थक शेयर करेंगे। विपक्ष को घेरिए, बयान आएगा। विपक्ष जवाब देगा, दूसरा बयान आएगा। फिर दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के बीच चले जाएंगे। और जनता? वह फिर अगले दिन नौकरी की तैयारी में बैठ जाएगी।
यही वह बिंदु है जहां देशभक्ति की राजनीति और नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच दूरी दिखाई देती है। देश से प्रेम केवल मंच पर गीत गाने से साबित नहीं होता। देश से प्रेम उस व्यवस्था को बेहतर बनाने से भी साबित होता है, जिसमें एक युवा बिना सिफारिश के नौकरी की उम्मीद कर सके, एक छात्र को परीक्षा की विश्वसनीयता पर भरोसा हो, पहाड़ का मरीज अस्पताल तक पहुंच सके और किसी गांव का बच्चा बारिश में स्कूल जाने से न डरे। वंदे मातरम् गाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है और उस पर सवाल पूछना भी। लेकिन किसी नागरिक या राजनीतिक दल की देशभक्ति का अंतिम प्रमाणपत्र बांटना लोकतंत्र को छोटा करता है। भाजपा विपक्ष को घेर रही है। विपक्ष भाजपा पर भावनात्मक मुद्दों के सहारे असली सवालों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा सकता है। दोनों के पास अपने तर्क हैं। लेकिन मतदाता के पास एक सीधा सवाल हैकृमेरे जीवन में क्या बदला?
यही सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव में भी लौटेगा। क्योंकि चुनावी मंच पर वंदे मातरम् की आवाज ऊंची हो सकती है, लेकिन गांव की टूटी सड़क की आवाज उससे भी पुरानी है। बेरोजगार युवा की बेचौनी किसी राष्ट्रगीत की धुन में खत्म नहीं होती। परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र को केवल राष्ट्रवाद नहीं, एक भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था भी चाहिए। देशभक्ति जरूरी है। राष्ट्रभावना जरूरी है। वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व भी निर्विवाद है। मगर लोकतंत्र में देशभक्ति को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने की राजनीति कितनी दूर जाएगी, यह सवाल भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि देश किसी एक पार्टी का नहीं है। न वंदे मातरम् किसी दल की संपत्ति है, न तिरंगा, न संविधान, न भारत। राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे। सरकारें बनेंगी और बदलेंगी। लेकिन देश रहेगाकृऔर जनता अपने सवालों के साथ वहीं रहेगी।
इसलिए अगली बार जब मंच से पूछा जाए कि कौन वंदे मातरम् के साथ है? तो शायद जनता को भी पलटकर पूछना चाहिए।कृठीक है, लेकिन मेरे रोजगार, मेरी सड़क, मेरे स्कूल और मेरे भविष्य के साथ कौन है? यही सवाल चुनावी शोर में सबसे ज्यादा सुनाई देना चाहिए।
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