सोमवार, 24 अगस्त 2026
किताबें खुलीं और अफसर ‘खामोश’
अनोखा विरोध
बच्चों ने बिना शोर-शराबे के नगर निगम को बना दिया स्कूल
निगम के दफ्तरों में क्लास,साइलेंट प्रोटेस्ट ने दागे तीखे सवाल
पढ़ाई का हक मांगने खुद निगम की चौखट पर आ पहुंचे मासूम
बच्चों की किताबों ने खोला निगम की अव्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड
देहरादून। स्कूल में पानी भर गया तो बच्चों ने छुट्टी मनाने के बजाय ऐसी जगह कक्षा लगाने का फैसला किया, जहां शायद उन्हें पढ़ाने की जरूरत सबसे ज्यादा थीकृनगर निगम के दफ्तर में। हाथों में किताबें और चेहरे पर मासूम सवाल लिए बच्चे नगर निगम पहुंचे और अधिकारियों के कमरों में ही अपनी कक्षा लगा दी। कुछ देर के लिए सरकारी दफ्तर, दफ्तर कम और स्कूल ज्यादा नजर आया। बच्चों ने अधिकारियों के कमरों में बैठकर पढ़ाई की। यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक मंच से नहीं था। न कोई लंबा भाषण, न नारेबाजी का शोर। बच्चों की किताबें खुलीं और पढ़ाई शुरू हो गई। संदेश इतना सीधा था कि उसके लिए माइक की जरूरत नहीं पड़ीकृजब स्कूल में पढ़ने की जगह पानी में बदल जाए तो बच्चे आखिर पढ़ने कहां जाएं?
यह तस्वीर सिर्फ रुड़की के एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें बारिश के बाद सड़क पर पानी भरना आम बात हो सकती है, लेकिन स्कूल के भीतर पानी भर जाना बच्चों की पढ़ाई का सवाल बन जाता है। फिर बच्चे स्कूल से निकलकर उसी व्यवस्था के दरवाजे पर पहुंचते हैं, जिसके पास इस समस्या का समाधान होना चाहिए। सोचिए, एक बच्चा अपनी किताब लेकर स्कूल पहुंचता है। उसे ब्लैकबोर्ड चाहिए, शिक्षक चाहिए और बैठने के लिए जगह चाहिए। लेकिन वहां पानी है। अब वह नगर निगम पहुंचता है और कहता है कि आपकी व्यवस्था के कारण हमारा स्कूल कक्षा के लायक नहीं रहा, इसलिए आज आपकी कक्षा में पढ़ेंगे।
नगर निगम के कमरों में बैठे अधिकारी शायद फाइलों के बीच बच्चों को देखकर कुछ पल के लिए सोचने को मजबूर हुए होंगे कि विकास की रिपोर्ट में स्कूल की यह तस्वीर किस खाने में दर्ज होगी? सरकारी फाइलों में जल निकासी की योजनाएं हो सकती हैं। नालों की सफाई के दावे हो सकते हैं। बारिश से पहले तैयारियों की बैठकें हो सकती हैं। लेकिन बच्चों की कक्षा में पानी भर जाने के बाद एक सवाल उन तमाम कागजों से बड़ा हो जाता हैकृक्या शहर इतना भी सक्षम नहीं कि बच्चों को सूखी जगह पर बैठाकर पढ़ा सके? इस प्रदर्शन की सबसे दिलचस्प बात यही रही कि बच्चों ने व्यवस्था को भाषण नहीं दिया। उन्होंने किताब खोल दी।
यही शायद इस प्रदर्शन की ताकत भी थी। बच्चों ने अधिकारियों के कमरे में बैठकर यह नहीं कहा कि आप काम नहीं करते। उन्होंने बस अपनी कक्षा वहीं लगा दी। बाकी सवाल कमरे में मौजूद हर व्यक्ति के सामने खुद खड़े हो गए। बारिश में स्कूल डूबता है तो केवल फर्श गीला नहीं होता। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, शिक्षकों की परेशानी बढ़ती है और अभिभावकों की चिंता भी बढ़ती है। सरकारी व्यवस्था के लिए यह एक जलभराव हो सकता है, लेकिन बच्चे के लिए यह उसका स्कूल, उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य है। शहरों को स्मार्ट बनाने की बातें अक्सर बड़े प्रोजेक्ट, सड़कों, पार्किंग, लाइट और दूसरी सुविधाओं के आसपास घूमती हैं। लेकिन किसी शहर की असली परीक्षा तब होती है जब बारिश होती है। यदि बारिश होते ही स्कूल में पानी भर जाए और बच्चों को नगर निगम में कक्षा लगानी पड़े, तो स्मार्टनेस के तमाम दावे बच्चों की किताब के एक पन्ने के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
बच्चों का यह अनोखा प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने व्यवस्था को उसकी भाषा में जवाब दिया है। अधिकारी दफ्तर में बैठकर काम करते हैं, बच्चे स्कूल में बैठकर पढ़ते हैं। जब स्कूल में बैठने की जगह नहीं रही तो बच्चे दफ्तर में आ गए। बच्चों ने अपनी कक्षा लगा दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली बारिश में उन्हें फिर नगर निगम की कक्षा न लगानी पड़े और वे अपने स्कूल में ही बैठकर पढ़ सकें। क्योंकि किसी भी शहर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके दफ्तर कितने सुंदर हैं, बल्कि यह है कि उसके बच्चों के स्कूल कितने सुरक्षित और पढ़ने लायक हैं और अगर बच्चों को अपनी पढ़ाई के लिए नगर निगम का कमरा चुनना पड़े, तो सवाल बच्चों से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिएकृआपकी कक्षा आखिर कहां लगी है?
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